Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |

How to keep yourself healthy in rainy season- What about this, says Acharya Charaka.{वर्षा ऋतू में कैसे रखें स्वयं को स्वस्थ्य – इस बारे में क्या कहते हें आचार्य चरक|}

वर्षा ऋतू में कैसे रखें स्वयं को स्वस्थ्य – इस बारे में क्या कहते हें आचार्य चरक|


        आचार्य चरक ने उत्तरायण और दक्षिणायन को दो नाम आदान काल और विसर्ग काल के नाम से वर्गीकृत किया है| आदान काल में शिशिर वसंत और ग्रीष्म ऋतू और विसर्ग काल में वर्षा, शरद, और हेमंत ऋतुएँ होती हें| आदान काल में क्रमश हिंदी माह के माघ-फाल्गुन, चेत्र- वैशाख, ज्येष्ट-आषाड़ (फरवरी अंत से जुलाई तक का भाग) और विसर्ग काल में क्रमश श्रावण-भादों,क्वार-कार्तिक, अगहन-पोष, मॉस(लगभग कुछ जुलाई, अगस्त,सितम्बर, अक्तूबर, नवम्बर,दिसंबर, और जनवरी का भाग) होते हें|
    आदान काल [Exchange period] में सूर्य उत्तरायण होता है, यह आग्नेय होने से अति उष्णता होती है वायु रुक्ष(रुक्ष) रहती है, सूर्य की गर्मी वायु का शोषण करती है, इससे शरीर में रुक्ष रस- तिक्त(कडवा), कषाय (कसेला), और कटु(चरपरा) रस बढता है| और शरीर कमजोर होता है| 
      विसर्ग काल [Colon period ] में सूर्य दक्षिण दिशा की और होने से गर्मी कम होती है, वातावरण सोम्य, सुखद, रहता है| वायु भी अति रुक्ष नहीं होती| इस काल में स्निग्ध रस- अम्ल(खट्टा), लवण(खारा), और मधुर (मीठा) होता है, जो मनुष्य शरीर में बल की वृधि करता है| ऋतुओं के अनुसार इन रसों में क्रमश अंतर अधिक स्पष्ट होता है| 
     आदान काल अर्थात उष्ण और रुक्ष समय के बाद जब वर्षा आती है उस समय मनुष्यों का शरीर दुर्बल, होता है उनकी जठराग्नि(पाचन शक्ति) कमजोर होती है| वरिश आने से वातावरण परिवर्तन से जिस प्रकार नए पेड-पोधे, बीज उगते और बड़ते हें वैसे ही विषाणु जीवाणु आदि भी तेजी से विकसित होते हें| अग्नि बल कमजोर होने से शरीर में वात की वृधि करते हें| वात वृद्धि का अर्थ है, रुक्षता, वेदना, आदि वात लक्षणों का बढना| 

वात सहित त्रिदोष नाशक द्रव्य का प्रयोग लाभकारी होगा| 
       आचार्य चरक ने इसके अंतर्गत केवल वात प्रकोप करने वाले रुक्ष खाद्य यथा सत्तू , दिन में सोना, ओस में घूमना, बेठना, नदी का जल, व्यायाम, धुप का सेवन, मैथुन आदि के लिए निषिद्ध(मना) किया है| 
       इस ऋतू में खाने पीने वाले पदार्थों में अम्ल और लवण रस वाले अधिक लाभकारी होंगे| अन्य मधुर रस के स्थान पर मधु (शहद), का प्रयोग भी लाभकारी है, क्योंकि यह शीतल और लघु पाकी होने से वात की अधिक वृद्धि नहीं होने देता| 
    आचार्य चरक ने इस काल में गर्म कर शीतल किया हुआ पानी पीने का निर्देश दिया है| 
    अन्य निर्देशों में प्रहर्षण( देह को घिसना या रगड़ना), उद्वर्तन(उबटन), स्नान(नहाना), गंध धारण (चन्दन हरिद्रादी लेप), सुगन्धित पुष्प माला आदि प्रयोग, के साथ हल्के पवित्र वस्त्र धारण, कर क्लेद रहित स्थान पर निवास के लिए कहा है| 

   अब हम इन बातो पर ध्यान दें तो पाएंगे की कितनी वैज्ञानिक और निरोगी रहने का मन्त्र इसमें छिपा हुआ है| 
     खट्टे, और लवण यक्त खाद्य अरुचि को दूर करते हें, अग्नि बढ़ाते हें| अधिक मीठा पाचन में गुरु या भारी होने से निषिद्ध कर उसके स्थान पर मधु या शहद जो पचने में आसान है का निर्देश किया है| 
    आपने अनुभव किया होगा की बरसात के समय घरों में पकोड़ी खाने की इच्छा होती है| नमक युक्त पकोड़ी हम चटनी अर्थात खट्टी या अम्ल से खाई जाती है, इसमें मीठापन नहीं होता तलने के लिए तेल का प्रयोग होता है, यह वात शामक है| 
    इसी प्रकार देखें की सभी जलाशय आदि का पानी जीवाणु विषाणु से संक्रमित होने से प्रदूषित होता है जो गरम करें पर शुद्ध होता है| 
     देह या शरीर पर आद्रता या गीलेपन के कारण चिपचिपापन प्रतीत होता है इसमें चरम रोग देने वाले जीवाणु विषाणु अपन निवास बनाते हें, इनसे बचने शरीर को रगड़ कर साफ करना, नहाना, उबटन जो हल्दी चन्दन आदि का लेप होता है को शरीर पर मलने से जीवाणु नष्ट होते हें|. फिर गंध धारण अर्थात खुले चेहरे अदि स्थानों पर हल्दी चन्दन आदि कीटाणु नाशक लेप लगाकर आने वाले जीवाणु-विषाणु को प्रतिबंधित करना, मन प्रसन्न रहे इस हेतु सुगन्धित पुष्प धारण, कर जल्दी सूखने वाले हल्के और पवित्र अर्थात पूर्ण स्वच्छ वस्त्र या कपडे पहनने का निर्देश, और अंत में सूखे स्थान पर निवास सहित कितना वैज्ञानिक और स्वास्थ्य को हितकारी है| 
      अब जरा हम वर्तमान आधुनिक दृष्टि से देखें तो पायेगे की जहाँ आचार्य चरक ने सूत्र रूप में कहा है उसे ही यदि ठीक प्रकार से जीवन में धारण कर लिया होता तो बरसात में होने वाले रोगों से आसानी से छुटकारा पाया जा सकता| 
     जल और वातावरण प्रदूषण, अनुचित खाद्य, और शरीर की उचित देखभाल के अभाव से होने वाले बरसात के रोग - डेंगू, मलेरिया, पेट संक्रमण (उल्टी, डायरिया, दस्त और पेट दर्द आंत्रशोथ आदि) चिकनगुनिया, टाइफाइड, फ़्लू या वायरल बुखार, हैजा, लेप्टोस्पाइरोसिस (गंदा पानी या गंदगी के साथ संपर्क के कारण इसमें सिर दर्द, मांसपेशियों में दर्द, बुखार, और सूजन होती है) पीलिया, पेरों में फंगस (या फफूंद) आदि एक बड़ी सूचि इस मोसम में होने वाले रोगों की है|


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जीवन के चार चरणौ में (आश्रम) में वान-प्रस्थ,ओर सन्यास अंतिम चरण माना गया है, तीसरे चरण की आयु में पहुंचकर वर्तमान परिस्थिती में वान-प्रस्थ का अर्थ वन-गमन न मान कर अपने अभी तक के सम्पुर्ण अनुभवोंं का लाभ अन्य चिकित्सकौं,ओर समाज के अन्य वर्ग को प्रदान करना मान कर, अपने निवास एमआइजी 4/1 प्रगति नगर उज्जैन मप्र पर धर्मार्थ चिकित्सा सेवा प्रारंंभ कर दी गई है। कोई भी रोगी प्रतिदिन सोमवार से शनी वार तक प्रात: 9 से 12 एवंं दोपहर 2 से 6 बजे तक न्युनतम 10/- रु प्रतिदिन टोकन शुल्क (निर्धनों को निशुल्क आवश्यक निशुल्क ओषधि हेतु राशी) का सह्योग कर चिकित्सा परामर्श प्राप्त कर सकेगा। हमारे द्वारा लिखित ऑषधियांं सभी मान्यता प्राप्त मेडिकल स्टोर से क्रय की जा सकेंगी। पंचकर्म आदि आवश्यक प्रक्रिया जो अधिकतम 10% रोगियोंं को आवश्यक होगी वह न्युनतम शुल्क पर उपलब्ध की जा सकेगी। क्रपया चिकित्सा परामर्श के लिये फोन पर आग्रह न करेंं। ।

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