Rescue from incurable disease

Rescue from incurable disease
लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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चमत्कारिक संजीवनी बूटी? - दशांग लेप!

चमत्कारिक संजीवनी बूटी? - दशांग लेप!
A Wondrous & Miraculous, Life saving herbal Medicine? - Dashang Lep,[coat]. 
  मेरे पिछले लगभग 50 वर्षीय चिकित्सकीय जीवन काल में आयुर्वेद के कई योगों ने आत्यधिक प्रभावित किया उनमें से एक है, दशांग लेप| 

Wheat sprouts in boiling water can we treat diabetes.

अंकुरित गेहू (उबलते पानी में रख कर अंकुरित) से डाईविटिज हमेशा के लिए ठीक हो सकती है? 
पिछले एक वर्ष से इस प्रकार की पोस्ट देखी जा रही है| इस बारें में कई ग़लतफ़हमी और धारणाएं बनी है| 
यह सच है की गेहूं ही नही किसी भी बिज को यदि 10 मिनिट उबला जाये तो वह फिर अंकुरित हो ही नही सकता|

पुत्रजीवक (PUTRANJEEVAK-Puntrajiva roxburghii) क्या सचमुच पुत्र (संतान) प्राप्ति के लिए है?

PUTRANJEEVAK-Puntrajiva roxburghii
पुत्रजीवक जिसे सामान्य भाषा में विशेषकर भारत और श्रीलंका में चाइल्ड लाइफ ट्री, लकी बीन ट्री, कहा जाता है के और सामान्य नाम - child's amulet tree, child-life tree, lucky bean tree, officinal drypetes, spurious wild olive, को अन्य भाषाओँ में भी जिस नाम से भी जाना जाता है, उससे पुत्र (संतान) शब्द का ही बोध होता है| 

पुत्र जीवक या पुत्रन्जिवा या Putranjiva,Putranjiva roxburghii, एक आयुर्वेदिक ब्रक्ष ओषधि है आजकल सुर्ख़ियों में|

आजकल एक आयुर्वेदिक ओषधि पुत्रन्जिवा Putranjiva, सुर्ख़ियों में है| 
बोटानिकल विवरण -Kingdom: PlantaeOrder:MalpighialesFamily: PutranjivaceaeGenus: PutranjivaSpecies: Putranjiva roxburghii

बाजरा या रागी Pearl Millet सेवन से - डाईविटीज, मोटापे से बचाव।

बाजरा
अँग्रेजी में पर्ल मिल्लेट (Pearl Millet (Pennisetum glaucum) कहा जाने वाला बाजरा कर्नाटक आदि में उत्पन्न होने वाला रागी फिंगर मिल्लेट(finger millet) जो बाजरा की ही एक किस्म है, कैल्शियम, लौह, प्रोटीन, रेशे और अन्य खनिजों का समृद्ध स्रोत है। इस अनाज में फेट्स वसा की मात्रा न के बराबर होती है और वह भी मुख्यतः आन्सेटुरेटेड फेट, (असंतृप्त वसा) होती है, पर इसमें ग्लूटिन नहीं होता इसलिए यह पचने आसान होता है।

फलों का बेताज बादशाह "आम"

आम
फलों का बेताज बादशाह "आम" का मोसम आ गया है, स्‍वास्‍थ्‍य के लिये अति उत्‍तम है।
आम में सैचरेटिड फैट (संतृप्त वसा), कोलेस्ट्रोल और सोडियम की मात्रा काफी कम होती है। साथ ही यह आहार संबंधी फाइबर, विटामिन B-6, विटामिन A और विटामिन C का भी अच्छा स्रोत माना जाता है।
आम डाईविटीज के रोगियों का शुगर लेबल अधिक कर हानी पहुंचा सकती है। अत: वे सावधान भी रहें।

आम का कच्चा फल जिसे कैरी के नाम से जाना जाता है, खट्टा, पर रुचि बड़ाने वाला, आंतों को सिकोड़ कर उनमें जमा मल को हटाने वाला, होता है इसका पना, कच्चा आम या कैरी को उबालकर, छिलका हटा कर छानकर, सिका जीरा, पुदीना, गुड, सेधानमक, नमक, और पानी मिलकर शर्बत की तरह स्वयं और अतिथियों को पिलाने से प्यास, पित्त,गर्मी शांत होती है, सन स्ट्रोक या लू से बचाव होता है, कब्ज दूर होती है, ग्रीष्म ऋतु में यह सर्वश्रेष्ट भारतीय पेय है। 

आम के आम और गुठलियों के दाम वाली कहावत आम पर भी एकदम फिट होती है। 
आम की गुठली का चूर्ण (2 से तीन ग्राम तक एक बार में ) खाने से अतिसार (दस्त लगाना) बंद होता है, यदि इसमें कच्चे बेल फल का चूर्ण और मिला लिया जाए तो असर भी दुगना होगा। 
आम की गुठली का चूर्ण रक्त प्रदर (महिलाओं को होने वाला रोग) खूनी ववासीर के रक्त को भी बंद करता है। पेट में पाये जाने वाले कृमि इससे मर जाते हें। 
आम का आचार जब भी बनवाएँ कुछ गुठलियाँ भी उनके ऊपर का पतला छिलका हटा कर डालें नए स्वाद के साथ कृमियों से भी बचे रहें।
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बिल्ब बेल फल, पत्ते,और जड़ शिवजी को प्रिय क्यों हें।

शास्त्रों में भगवान शिव को आदि चिकित्सक भी माना गया है। शिव ने ही अश्वनी कुमार और इन्द्र आदि देवताओं को आयुर्वेद सिखाया था।  शिवजी को चड़ने वाले इसके पत्र को सभी अच्छी तरह से जानते हें। इसके ओषधीय गुणो के कारण ही शिवजी को यह प्रिय भी है। 
  
महर्षि चरक ने आयुर्वेद में बेल को स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद फल कहा है। 
 बेल के फल के 100 ग्राम गूदे का रासायनिक विश्लेषण इस प्रकार है- नमी 61.5 प्रतिशत, वसा 3 प्रश, प्रोटीन 1.8 प्रश, फाइबर 2.9 प्रश, कार्बोहाइड्रेट 31.8 प्रश, कैल्शियम 85 मिलीग्राम, फॉस्फोरस 50 मिलीग्राम, आयरन 2.6 मिलीग्राम, विटामिन 'सी' 2 मिलीग्राम। इनके अतिरिक्त बेल में 137 कैलोरी ऊर्जा तथा कुछ मात्रा में विटामिन 'बी' भी पाया जाता है।

तुलसी एक वेद कालीन दिव्य ओषधि- क्या कहता है आधुनिक विज्ञान?

तुलसी एक वेद कालीन दिव्य ओषधि- क्या कहता है आधुनिक विज्ञान?
तुलसी,  (ऑसीमम सैक्टम) तुलसी शब्द का अर्थ है  जिसकी किसी से तुलना न की जा सके वह तुलसी है। 
धर्म से  जुढ्ने के कारण ही तुलसी वैदिक काल से वर्तमान काल तक की गिनी चुनी परिचित ओषधियों में से एक है। 
जिसे हिन्दू धर्मग्रंथों मेँ  वैष्णवी, वृन्दा, सुगंधा,गंधहारिणी,अमृता, पत्रपुष्पा,पवित्रा, श्र्वल्लरी, सुभगा, तीब्रा, पावनी,विष्णुबल्लभा, माधवी, सुरवल्ली, देवदुंदुभी, विष्णुपत्नी, मालाश्रेष्टा,पापघ्नी, लक्ष्मी, श्री-कृष्ण वल्लभा, आदि कई नामो से वर्णित किया गया है।   सभी हिन्दू संप्रदायों ने तुलसी के चमत्कार ओर गुणो पर रीझ  कर  नामानुसार अंगीकार किया है। गुणो के कारण तुलसी, भारत मेँ यह हर हिन्दू का सुपरिचित, घर मेँ मिलने वाला का सर्व रोग निवारक तथा जीवन शक्ति संवर्धक, एक अति पवित्र पोधा है।
आजकल व्यावसायिक लोगों ने इसका अर्क निकाल कर प्रस्तुत किया है जो निश्चय ही लाभदायक सिद्ध हुआ है, पर इसका मूल्य अत्यधिक रखा गया है, जो एक प्रकार की लूट है। 
आप भी तुलसी अर्क या बिन्दु अपने घर पर बना सकते हें। लिंक इस पोस्ट के आखिर मेँ है।  

काम शक्ति का स्त्रोत -सालम मिश्रीओर उसके चमत्कार।

शक्ति का स्त्रोत सालम मिश्री - या सालम पंजा  
शक्ति का स्त्रोत सालम मिश्री   
       अक्सर कुछ आदिवासी कबीले के स्त्री पुरुषों को सड़क पर मजमा लगाए, थेले टांग कर जड़ी बूटी बेचते हुए अकसर सभी ने देखा होगा। ये सालम मिश्री ले लो जेसी आवाज भी लगते देखे जाते हें। जिज्ञासा वश जब कोई उनसे पूछे तो वे मर्दांनगी की दवा बताते हें। कई लोग ले भी लेते हें विशेषकर ग्रामीण,  उसके उपयोग के बाद लाभ होने पर उनके अन्य साथी भी आकर्षित होते हें। अधिकांश लोग यह नहीं जानते की ये क्या हे?

नारियल- एक पोरुष वर्धक दिव्य फल।

नारियल- एक पोरुष वर्धक दिव्य फल। 
संस्कृत में नारिकेल, श्रीफल, बंगला में डाब, तामिल में इदेगाम, लेटीन में कोकस नुसीफेरा, अङ्ग्रेज़ी में कोकोनट के नाम से विख्यात परिपक्व नारियल में मांस वर्धक द्रव्य-5॰5%, फेट्स-35%, पानी-46%, शुगर 4.25%  होती हे। ग्लूकोज नहीं होता। कोमल नारियल के दूध में ग्लूकोज-3.75 % , ओर शुगर4% रहती हे। परिपक्व मलाबार में नारियल रस से बनाए गुड में, पानी 1.5% शुगर 87%, ओर इंवेर्टेड शुगर 9.5% होती हे।
परिपक्व नारियल को सुखाकर निकल तेल अम्ल रहित होता हे।
नारियल स्वादिष्ट,मधुर पाकी, पित्त नाशक, [प्यास-दाह को मिटाने वाला, ] हृदय को ताकत देने वाला काम शक्ति वर्धक होता हे।

  • कोमल कच्चा नारियल - पित्त ज्वर[ दाह जलन युक्त बुखार] , रक्त विकार, वमन[उल्टी] ठीक करने वाला, प्यास को शांत करने वाल होता हे। चबाने से मुहु के छाले मिटते हें।  नारियल खाने से पेट के क्रमी नष्ट हो जाते हें। कब्ज दूर होती हे। 
  • पका हुआ नारियल- पित्त जनक[दाह करने वाला], भारी, मल रोधक, रुचि वर्धक, मधुर, बल-वीर्य  वर्धक, होता हे। 
  • नारियल का पानी - विरेचक[दस्त लाने वाला], शीतल,वमन ओर मूर्छा दूर करने वाला, भारी,व शीतल होता हे। प्यास दूर करने के लिए सर्व श्रेष्ठ हे।  
  • सूखा नारियल- कठिनता से पचने वाला, दाह कारक,भारी, बल वीर्य वर्धक होता हे। 
  • नारियल का दूध- बल वर्धक, रुचिकारक, भारी, स्वादिष्ट, कुछ गर्म, कफ खांसी ओर गुल्म[पेट के गोले] ठीक करने वाला होता हे। बंगाल में माना जाता हे की इसका दूध अण्ड-कोश की सूजन ओर भरे पानी को ठीक कर देता हे। धातु क्षय की अवस्था में अति लाभकारी हे। 
  • नारियल का फूल- शीतल मधुर,मल रोधक, वैरी वर्धक मद[नशा] कारक, अम्लता वर्धक, क्रमी नाशक,ओर वात नाशक होता हे। 
  • नारियल से बनी ताजी ताड़ी-अति स्निग्ध, मद कारक[तत्काल] भारी, वीर्य वर्धक, होती हे। पर दोपहर बाद यही ताड़ी अम्ल युक्त होकर कफ कारक, पित्त जनक, ओर क्रमी नाशक हो जाती हे। यह शांति दायक ओर मूत्र रोगों को ठीक भी करती हे। 
  • नारियल का तेल- वाजी कारक [पोरुषत्व वर्धक], भारी, कमजोरों के लिए पोष्टिक,वैट-पित्त, नष्ट करने वाला, मूत्रघात[मूत्र रुकना] प्रमेह[मूत्ररोग], स्वास, खांसी, टी॰बी ठीक करने वाला, स्मरण शक्ति बड़ाने वाला, चोट या घाव  को जल्दी भरने वाला होता हे। यह क्रमी नाशक, बाल [हैयर] वर्धक [खाने  व लगाने से] ,होता हे। इसके तेल से बना मरहम दाद,खुजली ओर पेर के फटने को दूर करता हे। कोड लिवर आयल के स्थान पर इसका प्रयोग[दूध में मिलाकर खाने] भी लाभकारी हड्डियों को मजबूती देने का काम करता हे। शिशु की नारियल तेल से मालिश शिशु को सुंदर, बालिष्ट, बनती हे। यह ऑलिव आयल से अधिक लाभकारी होता हे।     

हिन्दू धर्म में नारियल को बहुत पवित्र माना गया हे ,इसी लिए इसको चड़ाने ओर प्रशाद रूप में खाने का रिवाज हे, इस प्रकार इसका अनजाने अनायास ही लाभ मिल जाता हें। यज्ञ या हवन की पूर्णाहुति में नारियल का गोला हवन सामग्री के साथ डाला जाता हे इसे बाद में निकाल कर भस्म बना कर चर्म रोगों को ठीक किया जा सकता हे। हवन न करें तो भी परिपक्व नारियल के गोले को हवन सामग्री+कपूर+गाय घी के साथ अग्नि में पूरा जला लें जब धुआँ आना बंद हो जाए बारीक पीस कर नारियल तेल में मरहम सा बना लें , यह दाद, खाज खुजली, ओर कई चर्म रोगों को दूर करने के लिए अति श्रेष्ठ ओषधि हे।
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मोटापा कम करने के लिए विश्व मे धाक जमानेवाली- आयुर्वेदिक ओषधि।


 मोटापा कम करने के लिए विश्व मे धाक जमानेवाली- आयुर्वेदिक ओषधि। 
--डॉ.मधु सूदन व्यास   
वजन घटाने ओर भूख को नियंत्रित  करने के लिए जिस आयुर्वेदिक जड़ी बूटी का अचानक महत्व बड़ा हे ओर कई नामी डाक्टर भी जिसकी ओर आकर्षित हुए हें वह हेव्रक्षाम्ला [Vrikshamla] या व्रक्ष+आंवला Garcinia Cambogia ओर Garcinia Indica जिसे दक्षिण भारत कोकम भी कहा जाता हे, ओर खाने मे खटाई की तरह उपयोग किया जाता हे।
वर्तमान मे कई नामी कंपनियों द्वारा भूख ओर मोटापे को नियंत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा रहा हे। हिमालया का '' व्रक्षाम्ला केपसूल'' फाइटो फार्म का ''गारसिनी केपसूल'' ओर भी कई आयुर्वेदिक फार्मेसियों द्वरा इसका अपने अपने नामो से विक्रय किया जा रहा हे। नेट पर सर्च करें तो हमे कई देशो में इस उत्पादन खरीदने बेचने के विज्ञापन मिल जाएंगे। वजन कम करने वाले सारे उत्पादन इसी पर बन रहे हें जिनकी कीमत हजारों रुपए में हे।
केसे काम करती हेयह ओषधि?
शोधो में पाया गया की इसके प्रयोग पेट में हाइड्रोसाइट्रिक एसिड [HCA] बनता हे। यह HCA न केवल पाचन बड़ाने मददगार होता हे बल्कि इसकी उपस्थिती सामान्य भोजन खाने के बाद भी व्यक्ति स्वयं को संतुष्ट महसूस करने लगता हे। इससे अधिक खाना खाने की इच्छा कम हो जाती हे। यही प्रक्रिया वजन घटाने में सहायक होती हे। यही नहीं इस प्रकार से होने वाली प्राक्रतिक पाचन क्रिया ह्रदय रोगो को रोकने में मदद करती हे। इसका असर वसा को शरीर में एकत्र होने से भी रोकता हे। यह फैटी एसिड संश्लेषण, lipogenesis, भोजन का सेवन को कम करवा कर वजन घटाते हें। यह एक suppressant के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें अवशोषण और वसा कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के संश्लेषण को बाधित हो जाने से होता हे।
  बहुत क्रियाशील हर्बल
उपरोक्त इस प्रक्रिया ने इसे एक बहुत क्रियाशील हर्बल दवा बना दिया है।  यह एक अच्छी तरह से मान्यता प्राप्त सभी दुनिया भर में वसा जलने की एजेंट बन गया हे और वर्तमान में अमेरिका, जापान, यूरोप और कई अन्य पश्चिमी देशों में एक लोकप्रिय होता जा रहा है। सभी देशो में इसका प्रयोग परहेज़, व्यायाम, और संतुलित पोषण आहार, के साथ उपयोग किए जाने का सुझाव दिया है.
इससे अन्य लाभ भी होते हें यह कम घनत्व वाले लिपोप्रोटीन और triglicerides के गठन को कम करती है, Garcinia lipids और फैटी एसिड के संश्लेषण को रोकता है। यह ग्लाइकोजन के संश्लेषण को बढ़ावा देने और दिमाग को यह संकेत भेजती हे की पर्याप्त भोजन खाया गया है। इसके सेवन से  विटामिन सी या ascorbic एसिड के महत्वपूर्ण मात्रा की पूर्ति भी होती हे। इसी लिए इसे एक दिल टॉनिक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। Garcinia lipids, शरीर में वसा और कोलेस्ट्रॉल के विरूद्ध एक कुशल एजेंट है।
ओषधि परिचय
इसका वानस्पतिक नाम [Botanical name] Garcinia gummi gutta या Garcinia Indica अन्य देशो में इसकी प्रजाति Garcinia Cambogia उपयोग की जाती हे। यह Clusiaceae- Family वनस्पति हे । संस्कृत में व्रक्षाम्ला [Vrikshamla] कहते हें क्षेत्रीय भाषा में कोकम, Kudampuli, Kudappuli, Marappuli [मलयालम]
आदि काई नामो से जाने जाने वाली यह ओषधि आयुर्वेदिक द्रष्टि से  स्वाद में अम्ल या खट्टी, गुण में गुरु, स्निग्धा, ओर उष्ण वीर्य या गर्म होती हे।
इसके बड़े आकार सदाबहार वृक्ष एक मध्यम ऊंचाई में 40 मीटर तक हो सकते हें।  इसके पत्ते सरल, विपरीत, ovate, तीव्र और चमक युक्त होते हें। नर ओर मादा लिंगीय फूल अलग अलग पेड़ में पाया जाता हे।  फल 6-8 धारी वाले 6-8 बीज से युक्त गूदे या लुगदी से ढके होते हें। इसके व्रक्ष जंगली रूप में या खेती के रूप में में लगाए जाते हें
ओषधिया उपयोगी भाग-पत्तियां, सूखे फल, फलो से तेल निकलता हे वह भी खट्टा होता हे।
गोआ के अत्तार इसके फल से बहुत अच्छा शर्वत तैयार करते हें, जो पित्त को शांत करता हे।
शरीर के वजन को कम करने के लिए यह जानना जरूरी हे की वजन बड़ाने के कारणो पर भी नियंत्रण करना जरूरी होता हे। ओषधि तो अपना काम करती ही हें, यदि सहयता मिल जाए तो चिकित्सा आसान हो जाती हे।
मोटापे के महत्वपूर्ण कारणों में से एक यह हे की हर साम्य कुछ कुछ खाते रहने।  फास्ट फूड, तला हुआ भोजन, बिना कोई व्यायाम किए रहना अधिक आराम, बेठ कर काम करने की आदत, अधिक सोना, पेय आदि का अत्यधिक सेवन।  यदि आप अत्यधिक वजन से छुटकारा प्राप्त करना चाहते हैं आप के लिए यह जरूरी हे की जीवन शैली में परिवर्तन कर लें।  इन सबके साथ यदि आप Vrikshamla का चूर्ण या घनसत्व से बने केपसूल का प्रयोग करते हें तो चमत्कारिक रूप से बिना कमजोरी वजन कम कर सकेंगे।
इसका प्रयोग निम्न विधि से किया जा सकता हे ।
  1. बाज़ार में उपलब्ध इसके घन सत्व से बने एक से दो केपसूल पानी से लें ।
  2. फल का चूर्ण बना कर पानी में मथ कर रख दें कुछ देर बाद में पिये ।
  3. चूर्ण सीधे 2-3 ग्राम तक खाया जा सकते हे।
प्रति दिन भोजन से पूर्व यदि 3-4 गोली मेदो हर गुगलू या नवक गुगलू शिलाजीत के साथ या शिलाजीत की गोली के साथ लिया जाए तो अधिक चमत्कारी परिणाम मिल सकते हें।
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समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें|

त्रिफला एक अद्भुत ओषधि-विश्व में हुई कई शोध |


त्रिफला
पृथ्वी पर जितने भी फल हें उनमे बिना कोई हानि पहुचाये केवल हित ही हित करने वाले तीन प्रकार के "फल" हमारे ऋषि-मुनियों को दिखलाई दिए वे तीन हरड बहेड़ा , और आंवले थे जिनके सयुक्त नाम को ही त्रिफला कहा गया।

त्रिफला इन तीन - हरड + बहेड़ा + आंवले ओषधिय पेड़ों के फलों का मिश्रण हे। अनुपात भेद या फल की जाती भेद से इसका शरीर पर प्रभाव न्यूनाधिक(कम-ज्यादा) हो सकता हे। जहाँ एकल ओषधि जो अपना प्रभाव हमारे शरीर पर करती हे वह प्रभाव उनके सम्मलित प्रभाव में अलग देखा जाता हे। फिर भी उन तीनो के अलग अलग सामान्य गुण समझना भी आवश्यक हे। देखें ।

महिर्षि चरक का कहना हे की "संसार में दो प्रकार के रसायन ( सभी रक्त, मांस आदि शारीर की धातुओं का पोषण कर सशक्त बनाना) होते हें,एक वय स्थापक ( आयु बडाने वाले) अथवा जीवन शक्ति(Vitality) बढाने वाले और दुसरे रोग निवारक शक्ति (Immunity) बडाने वाले।वयस्थापकों में आँवला और रोग निवारको में हरड सर्व श्रेष्ट होती हे। ये दोनों ही त्रिफला के प्रमुख घटक हें। गुठली रहित फल का छिलका त्रिफला के रूप में प्रयोग किया जाता हे।

अनेक शोधो द्वारा ज्ञात हुआ हे की त्रिफला एक अद्भुत ओषधि हे।
त्रिफला पाचन क्रिया को ठीक करने वाली और भूख को बढ़ाती हे।यह लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करने और शरीर में वसा कोलेष्ट्रोल की अवांछनीय मात्रा को हटाने में सहायता करती हे। त्रि‍फला का उपयोग रक्त के जमाव (थक्का जमने)से रोकने में किया जाता हे। यह गेस के कारन होने वाले सिर दर्द को दूर करने के लिएउपयोगी हे। मधु मेह या डाईवितिज के रोगी की में रक्त शर्करा के स्तरों को सामान्य बनाए रखने में मदद करती  हे।
त्रिफला चपापचय या मेटाबोलिजम को नियंत्रित कर शरीर के आंतरिक अंगों की सुरक्षा करता हे। त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां एक प्रकार से शारीर की आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं। अनावश्यक जमाव और अधिकता को कम करती हैं, पाचन और पोषक तत्वों के शरीर को प्राप्त होने या लगने की स्तिथि बनती हे।

आयुर्वेदिक ऋषियों के अनुसार त्रि‍फला ऐसी ही आयुर्वेदिक औषधी है जो शरीर का कायाकल्प कर सकती है। संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने वाले व्यक्तियों को ह्रदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नेत्ररोग, पेट के विकार, मोटापा आदि होने की संभावना नहीं होती। यह कोई 20 प्रकार के प्रमेह, विविध कुष्ठरोग, विषमज्वर व शोथ(सूजन) को नष्ट करता है। अस्थि, केश, दाँत व पाचन- संस्थान को बलवान बनाता है। इसका नियमित सेवन शरीर को निरामय, सक्षम व फुर्तीला बनाता है।

स्वस्थ‍ रहने के लिए त्रि‍फला चूर्ण महत्वपूर्ण है। 
त्रि‍फला सिर्फ कब्ज (Constipation reduction) दूर करने ही नहीं बल्कि आतों के गति को [Colon tonification & Gastrointestinal tract tonifing]ठीक कर आंतो की सफाई कर [Intestinal cleansing] पाचन क्रिया{Digestive balance}नियमित करती हे । इससे भोजन का सम्यक पाचन {Better food assimilation} होता हे जिससे कोलेस्ट्रोल नियंत्रित{Serum cholesterol balance} होकर रक्त सञ्चालन{Better circulation} होता हे। पित्त सँशोधन(Bile duct opening) करती हे। इस तरह से यह अपरोक्ष रूप से होने वाले सिरदर्द मूत्ररोग,किडनी का सुधार ,यकृत या लीवर को ठीक करती हे।
सक्षेप में कहा जा सकता हे की त्रि‍फला के नियमित सेवन से कमजोरी दूर होती है। या त्रि‍फला के नियमित सेवन से लंबे समय तक रोगों से दूर रहा जा सकता है।त्रि‍फला और इसका चूर्ण वात,पित्त व कफ को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बालों के खराब होने और समय से पूर्व सफेद होने से भी त्रि‍फला के सेवन से बचा जा सकता है।


केसे करें त्रिफला का सेवन -

सुबह के समय तरोताजा होकर खाली पेट ताजे पानी के साथ त्रि‍फला का सेवन करें और इसके बाद एक घंटे तक पानी के अलावा कुछ ना लें।

हमेशा मौसम के हिसाब से त्रि‍फला का सेवन करना चाहिए। यानी मौसम को ध्यान में रखकर त्रि‍फला के साथ गुड़, सैंधा नमक, देशी खांड, सौंठ का चूर्ण, पीपल छोटी का चूर्ण, शहद इत्यादि मिलाकर सेवन कर सकते हैं। अधिक अच्छा हे त्रि‍फला का सेवन करने से पहले या तो आप किसी अनुभवी वैद्य से संपर्क करें जिससे साथ त्रि‍फला का सही-सही और पूरा लाभ उठा सकें। पर यदि बिना परामर्श के भी लिया गया तो भी लाभ ही होगा यह कोई हानी नहीं करता। पर यह ध्यान रखना होगा की विशेषकर सस्ते के चक्कर में इसमें प्रयुक्त हरड , बहेड़ा और आवला पुराने फफूंद वाले न हों देखा गया हे की विक्रेता अधिक लाभ के लिए ख़राब द्रव्य का प्रयोग करते हे।
त्रिफला का नियमित सेवन चुस्त दुरुस्त और प्रसन्न कर सकता हे।

त्रिफला पर विश्व में हुई कई शोध 

विकिपीडिया पर दर्ज जानकारी के अनुसार त्रिफला पर समकालीन अनुसंधान में त्रिफला में एंटीनियोप्लास्टिक (अर्बुद या केंसर विरोधी) गुण पाए गए हें।

भारत के कई प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों, जैसे भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा की गई शोध से यह पता चला है कि एक त्रिफला में महत्वपूर्ण विषनाशक और कैंसर विरोधी कारक अत्यंत उपयोगी औषधीय गुण हैं।

कैंसर लेटर पत्रि‍का के जनवरी 2006 के अंक में प्रकाशित एक अध्ययन "एक कैंसर विरोधी औषधि के रूप में पारंपरिक आयुर्वेदिक मिश्रण त्रिफला की क्षमता" में, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के विकिरण जीवविज्ञान और स्वास्थ्य विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने पाया कि त्रिफला में ट्यूमर कोशिकाओं में साइटोटॉक्सिसिटी (कोशिका मृत्यु) प्रेरित करने की क्षमता तो है । जबकि वह सामान्य कोशिकाओं को वह इस रूप में प्रभावित नहीं करता।

इसी प्रकार जवाहर लाल विश्वविद्यालय में विकिरण एवं कैंसर जीवविज्ञान प्रयोगशाला के जरनल ऑफ़ एक्सपेरिमेंट एंड क्लिनिकल कैंसर रिसर्च में प्रकाशित दिसंबर 2005 की एक रिपोर्ट के अनुसार त्रिफला पशुओं के ट्यूमर के मामलों को कम करने और एंटीऑक्सीडेंट स्थिति बढ़ाने हेतु प्रभावी है.

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के वनस्पति विज्ञान विभाग की एक अन्य रिपोर्ट नेलिखा हे कि कैंसर कोशिका-रेखाओं पर "त्रिफला" का साइटोटॉक्सिक प्रभाव बहुत अच्छापाया गया और यह प्रभाव इस शोध में उपयोग की गई सभी कैंसर कोशिका रेखाओं पर एक समान था." फ़रवरी 2005 में जरनल ऑफ़ एथ्नोफ़ार्मेकोलॉजी में प्रकाशित परिणामों में यह कहा गया कि संभवतः "त्रिफला" में मौजूद एक प्रमुख पॉलीफ़ि‍नॉल, गैलिक अम्ल इन परिणामों का कारण हो सकता है. इन्हीं लेखकों ने पूर्व में यह बताया था त्रिफला में "अत्यधिक एंटीम्यूटेजेनिक/ एंटीकार्सिनोजेनिक क्षमता थी."
एंटीऑक्सीडेंट गुण
फरवरी 2006 में, डा. ए. एल. मुदलियार पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़ बेसिक मेडिकल साइंसेस, मद्रास विश्वविद्यालय, तारामणि कैंपस, के वैज्ञानिकों ने बताया कि त्रिफला की पूरक खुराक देने से एंटीऑक्सीडेंट में शोर-जनित-तनाव से होने वाले परिवर्तनों और साथ ही चूहों में कोशिका-प्रेरित प्रतिरोधक प्रतिक्रिया की रोकथाम होती है. इसका अर्थ यह है कि त्रिफला में एक तनाव-विरोधी कारक है।

इस अध्ययन का निष्कर्ष यह था, कि अपने एंटीऑक्सिडेंट गुणों के कारण त्रिफला शोर-जनित-तनाव से होने वाले परिवर्तनों को वापस ज्यों का त्यों कर देता है,या तनाव से रोगी को मुक्त करता हे।

ट्रॉम्बे स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के विकिरण रसायन विज्ञान और रासायनिक डायनेमिक्स प्रभाग में संचालित अध्ययनों में यह पता चला कि त्रिफला के तीनों घटक , सक्रिय हैं और वे अलग-अलग परिस्थितियों में कुछ भिन्न गतिविधियों का प्रदर्शन करते हैं और इन अलग-अलग घटकों की संयोजित गतिविधि के कारण त्रिफला मिश्रण के और अधिक कार्यकुशल होने की अपेक्षा की जाती है. इस अध्ययन के परिणाम फ़ाइटोथेरेपी रिसर्च के जुलाई 2005 के अंक में प्रकाशित किए गए थे.।

दो महीने बाद, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने त्रिफला के एक घटक की रेडियो रक्षात्मक क्षमता की जानकारी दी.

इसी तरह के परिणाम कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज, मणिपाल की ओर से जरनल ऑफ़ ऑल्टरनेटिव एंड कॉंप्लिमेंटरी मेडिसिन में प्रकाशित किए गए थे जहां वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि "आयुर्वेदिक रसायन औषधि त्रिफला की मदद से विकिरण टॉलरेंस में 1.4 ग्रे गामा-किरणन की वृद्धि हुई". उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जहां त्रिफला से गैस्ट्रोइंटेस्टिनल और हीमोपोयटिक मृत्यु से सुरक्षा प्रदान की जा सकी, वहीं पशु 11 GY से अधिक किरणन के संपर्क में आने के बाद 30 दिनों से अधिक नहीं जी पाए।
एलिसन रॉस, विज्ञान अधिकारी, नामक ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने आशा जताई है कि एक दिन भारतीय आयुर्वेदिक औषधि त्रिफला से पाचन ग्रंथि के
कैंसर का इलाज किया जा सकेगा।
पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के कैंसर संस्थान की एक टीम ने चूहों पर किए एक प्रयोग में पाया कि
त्रिफला चूर्ण के इस्तेमाल से पैनक्रियाज़ यानी पाचन ग्रंथि में होने वाले कैंसर का बढ़ना कम हो
जाता है।
अमेरिकन ऐसोसिएशन फ़ॉर कैंसर रिसर्च में पेश अध्ययन से आशा जगी है कि एक दिन त्रिफला
से इस रोग का इलाज भी हो पाएगा।

लेकिन विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अभी यह शोध अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है।
पाचन ग्रंथि का कैंसर का इलाज बहुत कठिन है इसलिए इलाज के नए तरीके खोजने की ज़रूरत है।
ये सब अभी प्रारंभिक प्रयोग हैं. त्रिफला को लेकर भविष्य में बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है।
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त्रिफला से बनी कई ओषधियाँ  जो बाज़ार में उपलब्ध हें।
त्रिफला चूर्ण / त्रिफला घृत, त्रिफलारिष्ट, त्रिफला के केप्सुल्स और गोलियां।
लगभग सभी आयुर्वेदिक ओषधियों में इनका उपयोग होता हे ।
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 हरड- संसार की दो सर्वश्रेष्ट रसायन गुण वाली ओषधियो 
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समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें|

बहेड़ा (टर्मिनेलिया वेलेरिका) - तीसरा सर्व श्रेष्ट आरोग्यकर ओषध|

बहेड़ा हिंदी में और संस्कृत में बिभीतक अंग्रेजी में Bedda nuts लेटिन में टर्मिनेलिया वेलेरिका के नाम से जाने जाने वाला त्रिफला का एक घटक लगभग चालीस फिट तक या ओअर भी अधिक की उचाई वाला गोल ताने का एक विशाल वृक्ष 3 से 8 इंच तक के अंडाकार चोड़ाई वाले पत्ते वाला शीतकाल से फूल कर ग्रीष्म तक फलने वाली वनस्पति हे।  
 बहेड़े के फल के छिलके या बक्कल का त्रिफला या अन्य ओषधियों में प्रयोग किया जाता हे। इसकी विशेष क्रिया गले और श्वास नलियों पर होती हे। इसीकारण इसका प्रयोग सर्दी जुकाम,खांसी,स्वरभंग, आदि में विशेष रूप से किया जाता हे। 


इसके बारे में आचार्य सुश्रुत ने लिखा हे- 
   भेदन करने वाला या दस्त लगाने वाला रुखा और गर्मप्रक्रति वाला सर्वोत्तम कृमि नाशक होता हे। नेत्रों को हितकारी,स्वाद बढाने वाला, उदर(पेट) में पहुच कर मधुर पाची, स्वाद में कसेला, कफ पित्त को नष्ट करने वाला होता हे। 

बहेड़े के फल के छिलके को आँखों के दर्द में ने पर घिसकर लगाने से लाभ होता हे।
भूख बडाने वाला यह ओषध तीसरा सर्व श्रेष्ट आरोग्यकर होने से त्रिफला में प्रयुक्त होता हे।
इसको गुड के साथ खाने से नपुंसकता दूर होती हे। भेदे का छिलका चूसने से खांसी मिटती हे।
अकेले इसका बहुत अधिक सेवन गुर्दे को हानि कर सकता हे पर यदि शहद या शक्कर के साथ लें तो हानि नहीं पहुचती। पर त्रिफला के रूप में भी कोई हांनी नहीं करता। 
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हरड- संसार की दो सर्वश्रेष्ट रसायन गुण वाली ओषधियों में से एक।


हरड- संसार की दो सर्वश्रेष्ट रसायन गुण वाली ओषधियों में से एक।
हरड - हरडे ,हर्र, हरीतकी,अभया, Myrobalans / Terminaliya Chebula आदि नामो से जानी जाने वाली इस हरड के बारे में  महिर्षि चरक का कहना हे की "संसार में दो प्रकार के रसायन ( सभी रक्त, मांस आदि  शारीर की धातुओं का पोषण कर सशक्त बनाना) होते हें,एक वय स्थापक ( आयु बडाने वाले) अथवा जीवन शक्ति(Vitality) बढाने वाले और दुसरे रोग निवारक शक्ति (Immunity) बडाने वाले।वयस्थापकों में आँवला और रोग निवारको में हरड सर्व श्रेष्ट होती हे। इसीकारण यह त्रिफला   का एक प्रमुख घटक हे। 
इसका  15-24  मीटर ऊँचा एक बृक्ष होता हे इसकी एक जोड़ी के साथ अण्डाकार रुए दार पत्तियां होती हें। अंडाकार  पीलापन लिए सफेद फूल दुर्गन्ध युक्त होते हें। और हरड या फल  नारंगी रंग से बदलते हुए पीले लाल या काले और कठिन परिपक्व, 3-5 सेमी लम्बा, पाँच स्पष्ट रेखा जिसे निशान वाला, सुखाने पर काटने का निशानवाला होता हे। सात जाती की हरड में से विजया सर्वत्र पैदा होती हे और बड़ी हरड के नाम से जानी जाती हे सफ़ेद फुल वाली चेतकी जाती की एक अंगुल लम्बी काली बाल हरड होती हे।  हरड में रसायन गुण कम रेचक गुण अधिक होने से त्रिफला के लिए श्रेष्ट नहीं माना गया हे। पर जहाँ रेचक गुणों की जरुरत अधिक हो वहां इसका उपयोग किया जाना चाहिए।
यह एक अत्यंत प्रभावशाली दिव्य, रसायन गुण वनस्पति हे। 
हरड का प्रमुख काम शरीर के विजातीय(अनावश्यक) द्रव्यों को बाहर कर प्रत्येक अंग की गति शीलता को व्यवस्थित करना होता हे। इस तरह पेट,रक्त,मष्तिष्क ,ह्रदय,जननेद्रिय,आदि में जहाँ कही भी दोष हो उसे बाहर कर शोधित कर देगी। 
यही विलक्षणता इसकी आदि काल से आज तक की प्रसिद्धि का कारण हे। किसी भी आयु के मनुष्य (शिशु से पूर्णायु तक) ही नहीं किसी भी प्राणी को उसके लिए उचित मात्रा देने पर माता के सामान लाभ देती है।  (मात्रा अधिक या कम होने पर भी हानी नहीं पहुचाती)।  यह दस्तावर होने के बाद भी पेट शोधन के बाद दस्त बंद भी करती हे। इससे जठराग्नि (भूख)प्रबल हो जाती हे। 

  • हरड दातों से चबा कर खाने से अग्नि(भूख) बढाती हे।
  • हरड  पीस कर खाने से मल का शोधन(शोच ठीक करना) करती हे।
  • हरड भून कर खाने से तीनो दोषों को ठीक करती हे। 
  • हरड भोजन के साथ खाने से बुद्धि और बल बढाती हे।मल मूत्र को साफ करती हे।
  • भोजन के बाद खाई गई हरड खाए अन्न और जल के दोषों को दूर करती हे।
  • हरड लवण (नमक) के साथ खाने से कफ दोष, मिश्री के साथ पित्त(जलन आदि)दोष ,घी के साथ सेवन से वात( दर्द युक्त) दोष एवं गुड के साथ सम्पूर्ण दोषों को नष्ट करती हे।
  • हरड वर्षा ऋतु में सेंधा नामक के साथ शरद ऋतु में पीपर(लेंडी पीपल) के साथ, वसंत ऋतु में मधु(शहद) के साथ ग्रीष्म ऋतु में गुड के साथ खाने से परम रसायन( सभी रक्त, मांस आदि  शारीर की धातुओं का पोषण कर सशक्त बनाना) का काम करती हे। 
  • बबासीर में सेंधा नमक के साथ पर खूनी बबासीर में इसका क्वाथ(काडा) दिया जाना लाभकारी हे। चूर्ण को गुड के साथ देने से खुनी बबासीर में लाभ होता हे।
  • अर्श के मस्से पर इसको पानी के साथ पीस कर लेप करने से सुजन और दर्द ठीक होता हे।
  • अधिक पसीना आने,पुरानी सर्दी जुकाम,नजला(नाक बहना),चोट के घावों के पाक जाने पास बहने की समस्या से इसका सेवन छुटकारा दिलाता हे।
  • मुहांसे या मुहं पर व्रण इसे घिस कर लगाने से ठीक होते हें।
  • हरड का चूर्ण गरम पानी के साथ देने पर 'हिचकी' आना बंद हो जाती हें।
  • हरड का मुरब्बा आमातिसार (नए दस्त) बंद कर भूख बढाता हे।

बाज़ार में इससे बनी निम्न ओषधियां मिलती हें जो विवरण अनुसार लाभकारी हें।
*त्रिफला चूर्ण या गोली, * अभयारिष्ट * हरड मुर्रब्बा
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 आंवले की महिमा:/त्रिफला पर विशेष लेख शीघ्र
 बहेड़ा (टर्मिनेलिया वेलेरिका) - तीसरा सर्व श्रेष्ट.
त्रिफला एक अद्भुत ओषधि-विश्व में हुई कई शोध |:

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गिलोय- शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट- स्वाइन फ्लू के चिकित्सा के लिए दिव्य ओषधि

यह एक जड़ी बूटी है जो स्वामी रामदेव के पतंजलि योग
के द्वारा स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए सिफारिश की गई हे।
 यह भी बर्ड फ्लू और chikengunia के मामले में सिफारिश की है.
गिलोय सारे भारत में पाई जाने वाली यह दिव्य ओषधि जिसे संस्कृत में गडूची और अम्रतवल्ली, अमृता,मराठी में गुडवेल, गुजराती में गिलो,लेटिन में टिनिस्पोरा कोर्डीफ़ोलिया, के नामो से जाने जाने वाली वर्षो तक जीवित रहने वाली यह बेल या लता अन्य वृक्षों के सहारे चडती  हे। नीम के वृक्ष के सहारे चड़ने वाली गिलोय ओषधि उपयोग के लिए सर्व श्रेष्ट होती हे, इसीकारण इसे नीम-गिलोय भी कहा जाता हे। इसका फल लाल झुमकों में लगता हे। अगुठे जेसा मोटा तना प्रारम्भ में हरा, पकने पर धूसर रंग का हो जाता हे यही तना ओषधि के काम आता हे।
कसेली,कडवी,उष्ण वीर्य,रसायन,यह गिलोय मलरोधक,बल बर्धक,भूख वर्धक,आयु वर्धक,ज्वर,पीलिया,खांसी,से लेकर लगभग 20 से अधिक सामान्य रोगों को ठीक करती हे। और किसी भी प्रकार की हांनी नहीं पहुचाती। आयुर्वेद की द्रष्टि से शामक प्रभाव वाली यह ओषधि दिव्य इसलिए हे क्योकि यह सभी बड़े हुए या घटे हुए दोषों को सम करके कुपित दोषों पर शामक प्रभाव डालकर उन्हें सम या सामान्य करके रोगों से मुक्त करती हे। इसीकारण यह अमृता कहलाती हे।
ज्वर - को ठीक करने का इसमें अद्भुत गुण हे। यद्यपि यह मलेरिया पर अधिक प्रभावी नहीं हे परन्तु शारीर की समस्त मेटाबोलिक क्रियाओं को व्यवस्थित करने के साथ सिनकोना चूर्ण या कुनाईनं (कोई भी एंटी मलेरियल) ओषधि के साथ देने पर उसके घातक प्रभावों को रोक कर शिग्र लाभ देती हे। समस्त मलेरियल ओषधि चाहे वे किसी भी पेथि की हों के साथ गिलोय या इसका सत्व देने पर मलेरिया में अधिक लाभ होता हे।
टाइफ़ोइड या मोती झरा में आश्चर्यजनक प्रभाव होता हे। जब कोई भी ओषधि से मंद ज्वर नहीं जाता तो गिलोय चूर्ण या सत्व को तुलसीपत्र,वनफशा,रुद्राक्ष चूर्ण,कालीमिर्च के साथ शहद के साथ देने पर चमत्कारिक रूप से रोगी स्वस्थ हो जाता हे।
यकृत (लीवर) के रोग,बड़ी हुई तिल्ली(स्प्लीन) जलोदर,कामला,पीलिया,पर इसका बड़ा प्रभाव देखा गया हे।
खाज खुजली जेसे चर्म रोग में शुद्ध गूगल के साथ बड़ी लाभकारी सिद्ध हुई हे इस हेतु "अमृता गुगलू " के नाम से गोली के रूप में बाज़ार में मिलती हे।
यह गाउट, प्रारम्भिक  सिफलिस, गठिया, कब्ज, तपेदिक, कुष्ठ के उपचार में भी लाभदायक है. यह एक शक्तिशाली रक्त शोधक है. यह एक टॉनिक और कामोद्दीपक के रूप में कार्य करता है. 
यह एक जड़ी बूटी है जो स्वामी रामदेव के पतंजलि योग के द्वारा स्वाइन फ्लू के चिकित्सा  के लिए सिफारिश की गई हे। यह भी बर्ड फ्लू और chikengunia के मामले में सिफारिश की है.

गिलोय की  जड़ें शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है। यह कैंसर की रोकथाम और उपचार में प्रयोग की जाती है। गिलोय उच्च कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने के लिए, शर्करा का स्तर बनाए रखने में मदद करता है और जिगर के रूप में अच्छी तरह से बचाता है. यह  बुढ़ापे से बचने के लिए मजबूत कारक के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह गंभीर बीमारियों, गठिया, खाध्य एलर्जी और एनीमियाया खून की कमी के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता हे।
 यह तनाव को हटाने के लिए मदद करता है. यह भी बवासीर और पेचिश में राहत प्रदान करने के लिएभी जाना जाता हे।  कमजोरी, अपच, अज्ञात मूल के pyrexias (बुखार) और कई मूत्र मार्ग में संक्रमण जैसी स्थितियों में प्रयोग किया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और आयुर्वेदिक डॉक्टरों का कुछ भी ऐसे सूजाक रूप में कुछ यौन संचारित रोगों के लिए भी उपयोगी कहा हे।


 अमृता शोथ या सूजन और ज्वरनाशक गुण के कारण इसका सदियों प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक  कर संक्रमण के विरुद्ध  शरीर को तैयार करने के लिए सर्वश्रेष्ट है।इसीकारण यह  आयुर्वेदिक रसायन के रूप में प्रयोग किया जाता हे। एक वैज्ञानिक शोध में यह अद्भुत आयुर्वेदिक जड़ी बूटी सुरक्षात्मक WBC (श्वेत रक्त कोशिकाओं) की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के रूप में जाना जाता है खुद की सुरक्षा तंत्र बनाता है.
इस कड़वी गिलोय में मौजूद गुणों नियतकालिक रोगरोधी और antispasmodic गुण हे। जो  स्वाइन फ्लू को रोकने में मददगार है।

इसका ओषधि प्रयोग चूर्ण / गिलोय  सत्व / गिलोय घन सत्व' के रूप में होता हे। बाज़ार में भी इसी नाम से मिलता हे। ये दोनों गिलोय सत्व एवं गिलोय घन सत्व'  बहुत उपयोगी पाउडर है जो  जड़ी बूटी गिलोय  के महान गुण क्षमता रखती हे  सकारात्मक बात यह हे कि इसकी  मामूली मात्रा  भी यह अद्भुत काम करती है। इससे गिलोय चूर्ण के रूप में न केवल अधिक मात्रा बचा जा सकता हे वहीँ कड़वाहट से भी छुटकारा मिल जाता हे।
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 गिलोय सत्व एवं गिलोय घन सत्व बनाने की विधि



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अजवायन -घर पर छुपा हुआ वेद्य |


अजवायन (Thymus)(Parsley) 
जिसे संस्कृत में यवानी,मराठी में ओंवा,गुजरती में अजमोद,बंगाली में यमानी,लेटीन में केरम कोप्तिकम कहते हें। भारतीय रसोईघर का जानापहिचाना मसाला और घर में छुपा हुआ वेद्य हे। जो अनजाने ही हमें कई रोगों से बचा लेती हे यदि हम उसका प्रयोग नित्य करते हें। 
कहा गया हे
  "एका यवानी शतमन्नपाचीका " अजवायन एक ऐसी चीज या औषधि है,जो अकेली ही एक ऐसी जो कि सौ प्रकार के खाद्य पदार्थों को पचाने वाली होती है।  अनेक प्रकार के गुणों से भरपूर अजवायन पाचक रूचि कारक,तीक्ष्ण, कढवी, अग्नि प्रदीप्त करने वाली, पित्तकारक तथा शूल, वात, कफ, उदर आनाह, प्लीहा, तथा क्रमि इनका नाश करने वाली होती है। 
 अलसी यानी फ्लैक्सीड-
सेक्स समस्याओं का उपचार
:   /
 लौंग (लवंग Cloves )/ 
 नीम के स्वास्थ्य लाभ
 अंगूर खाकर वजन घटाए 
अति  गर्म प्रकृति वालों के लिए यह हानिकारक होती है। 
इसकी खेती सारे देश में होती है। 
उपयोग- अजवायन का उपयोग औषिध के रूप में, मुख्यत: उदर एवं पाचन से समबन्धित विकारों तथा वात व्याधियों को दूर करने में बहुत गुणकारी होती है। 

अजवायन में लाल मिर्च की तेजी,  राई की कटुता तथा हींग और लहसुन की वातनाशक गुण एक साथ मिलते हें। इस लिए यह गुणों का भंङार है । इसी लिए यह  उदर शूल, गैस, वायुशोला, पेट फूलना, वात प्रकोप आदि को दूर करता है। इसी कारण इसे घर पर  छुपा हुआ वेद्य कहा गया है। 

चावल से चिकित्सा

 चावल (Rice)के बारे में?

 आप क्या जानते हें?

     धान्य/शाली/तांदुल /भात/चोखा/अर्ज(अरबी)/आरिशी/नेलु/Oryza Satava आदि नामो से भी जाना जाने वाला चावल के बारे में कुछ लोगों का मानना हे की इसे खाने से मोटापा बढता हे, यह एक भ्रान्ति हे, कुछ लोग चावल को पूर्ण भोजन के बाद खाते हें,तब यह अतिरिक्त भोजन ही बजन बढाने का कारण होता हे।
 Nutrients: Content per 100 g-
 विरूद्ध आहार-विहार:अर्थ हे, एक साथ नहीं खाए खाद्य
चावल में पानीWater 12.9 % / मांस वर्द्धक तत्व(प्रोटीन)-7.5g / चर्बीLipids-6%/ Carbohydrate 77.8 gFiber 1.4 g /
     चावल अधिक चमकदार एवं सुन्दर बनाने के लिए इस पर पोलिश की जाती हे। इससे इसके ऊपर की पर्त जो मांस वर्द्धक,एवं तेल सहित, विटामिन्स और खनिज का भंडार होती हें नष्ट हो जाती हे , इससे चावल के गुण कम हो जाते हे। बिना पोलिश का चावल अधिक गुणवान और पोष्टिक होता हे पर स्वाद और रंग रूप के मान से कम होने के कारण पसंद नहीं किया जाता। 
सामन्यतय इस अन्न में विटामिन कम होने से जिन प्रान्तों मे इसे प्रमुख रूप से खाया जाता हे,वहां या केवल चावल पर निर्वाह करने वालों को "बेरी-बेरी" नामक रोग हो जाता हे।    
    चावल बहुत सारे देशों में मुख्य भोजन में शामिल है, लेकिन क्या आपको पता है चावल शारीरिक स्वास्थ के लिए भी उपयोगी होता हे। यह पचने में भी आसान होता है। चावल जितना पुराना हो उतना ही स्वादिष्ट और पोष्टिक होता है। चावल को सब्जी,

अलसी यानी फ्लैक्सीड- सेक्स समस्याओं का उपचार



 अलसी एक ऐसी ही जड़ी बूटी है जो कि ओमेगा 3 फैटी एसिड का महत्वपूर्ण स्रोत है। यह तो हम जानते ही हैं कि शरीर को चुस्त-दुरूस्त रखने में ओमेगा 3 फैटी एसिड का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन क्या आप जानते हैं अलसी यानी फ्लैक्सीड के जरिए तमाम तरह की सेक्स समस्याओं से निजात पाई जा सकती हैं।
प्राकृतिक जड़ी बूटियों का शरीर को स्वस्थ रखने और
कई  गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए आज के समय
 में प्राकृतिक जड़ी बूटियों का बहुत महत्व है, इनका
असर बहुत प्रभावशाली होता है और कोई
 साइड इफेक्ट भी नहीं होता।
 अलसी क्या है? अलसी का उपयोग कैसे किया जाता है और किस तरह अलसी से सेक्स समस्याओं का उपचार किया जा सकता है।  जानें अलसी से सेक्स समस्याओं के उपचार के बारे में कुछ और दिलचस्प बातें।
अलसी क्या है?
अलसी {अलसी स्टार फूड }एक जड़ी बूटी है जिसमें लिनोलेनिक नामक एसिड पाया जाता है जो कि ओमेगा 3 फैटी एसिड का महत्वपूर्ण स्रोत है। इतना ही नहीं अलसी एंटी ऑक्सीडेंट से भरपूर औषधी है जो कि व्‍यक्ति को प्रोटेस्ट कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से भी बचाती हैं।
अलसी का प्रयोग
पुरूषों को आमतौर पर बढ़ती उम्र में प्रोटेस्ट कैंसर हो जाता है जो कि सेक्स समस्याओं का मुख्य कारक है। प्रोटेस्ट कैंसर से ब्लैडर कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। अलसी के सेवन से ना सिर्फ सेक्स समस्याओं से बचा जा सकता है बल्कि कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों से भी बचा जा सकता है।
अलसी को चूर्ण, गोली के रूप में या फिर खाने के साथ मिक्स करके भी लिया जा सकता है।  
 विरूद्ध आहार-विहार:अर्थ हे, एक साथ नहीं 
अलसी एक प्राकृतिक तत्व है ।अलसी के सेवन से आप कुछ सेक्स समस्या्ओं जैसे जल्दी उत्तेजित होना या सेक्स के दौरान नर्वस होना, शारीरिक दुर्बलता होना, सेक्स में रूचि कम होना, बांझपन, बार-बार गर्भपात होना, स्तनपान के दौरान दूध ना आना इत्यादि समस्याओं से रोजाना अलसी का सेवन करके निजात पा सकते हैं।
क्या कहते हैं शोध?
हाल ही में आए शोध में भी इस बात को पुख्ता किया गया कि अलसी यानी फ्लैक्सीड से आप तमाम गंभीर सेक्स समस्याओं से भी निजात पा सकते हैं। शोधों के मुताबिक, यदि किसी को कोई सेक्स समस्या होती है तो उसका मुख्य कारण पेल्विक की कोशिकाओं में रक्त का ठीक तरह से संचार ना होना। लेकिन जब आप इस समस्या के दौरान अलसी का प्रयोग करते हैं तो आपकी रक्त वाहिनियां खुल जाती हैं और धीरे-धीरे रक्त वाहिनियों में रक्त का संचार भी बढ़ जाता है। इतना ही नहीं शोधों में यह भी बता सामने आई है कि जिन लोगों की सेक्स में रूचि नहीं होती उनकी उत्तेजना बढ़ाने में अलसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दरअसल अलसी{अलसी स्टार फूड } में कई गुणकारी तत्व मौजूद होते हैं इनमें से उत्तेजना बढ़ाने वाला एक तत्व एफरोडाइसियेक्स भी मौजूद होता है।

समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें|

तुलसी एक 'दिव्य पौधा' -BENEFITS OF TULSI

BENEFITS OF TULSI !!
 तुलसी एक 'दिव्य पौधा' 

भारतीय संस्कृति में तुलसी के पौधे का बहुत महत्व है और इस पौधे को बहुत पवित्र माना जाता है। ऎसा माना जाता है कि जिस घर में तुलसी का पौधा नहीं होता उस घर में भगवान भी रहना पसंद नहीं करते। माना जाता है कि घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगा कलह और दरिद्रता दूर करता है। इसे घर के आंगन में स्थापित कर सारा परिवार सुबह-सवेरे इसकी पूजा-अर्चना करता है। यह मन और तन दोनों को स्वच्छ करती है। इसके गुणों के कारण इसे पूजनीय मानकर उसे देवी का दर्जा दिया जाता है। तुलसी केवल हमारी आस्था का प्रतीक भर नहीं है। इस पौधे में पाए जाने वाले औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेद में भी तुलसी को महत्वपूर्ण माना गया है। भारत में सदियों से तुलसी का इस्तेमाल होता चला आ रहा है।


* लिवर (यकृत) संबंधी समस्या: तुलसी की 10-12 पत्तियों को गर्म पानी से धोकर रोज सुबह खाएं। लिवर की समस्याओं में यह बहुत फायदेमंद है।

कम कैलोरी वाला पौष्टिक फल जामुन

जामुन - परिचय 

जामुन (वैज्ञानिक नाम : Syzygium cumini) एक सदाबहार वृक्ष है जिसके फल बैंगनी रंग के होते हैं ( लगभग एक से दो सेमी. व्यास के) | यह वृक्ष भारत एवं दक्षिण एशिया के अन्य देशों एवं इण्डोनेशिया आदि में पाया जाता है। इसे विभिन्न घरेलू नामों जैसे जामुन, राजमन, काला जामुन, जमाली, ब्लैकबेरी आदि के नाम से जाना जाता है। प्रकृति में यह अम्लीय और कसैला होता है और स्वाद में मीठा होता है। अम्लीय प्रकृति के कारण सामान्यत: इसे नमक के साथ खाया जाता है।
विवरण 
जामुन का फल 70 प्रतिशत खाने योग्य होता है। इसमें ग्लूकोज और फ्रक्टोज दो मुख्य स्रोत होते हैं। फल में खनिजों की संख्या अधिक होती है। अन्य फलों की तुलना में यह कम कैलोरी प्रदान करता है। एक मध्यम आकार का जामुन 3-4 कैलोरी देता है। इस फल के बीज में काबरेहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम की अधिकता होती है। यह लोह का बड़ा स्रोत है। प्रति 100 ग्राम में एक से दो मिग्रा आयरन होता है। इसमें प्रोटिन, विटामिन ए, बी, सी, वसा खनिज द्रव्य व पौष्टिक तत्व होते हैं। जामुन बरसात में होने वाला फल है। इसमें थोड़ा खारापन व रुखापन रहता है। जिससे जीभ में ऐंठन हो जाती है। इसलिए यह कम मात्रा में खाया जाता है। बड़े जामुन स्वादिष्ट, भारी, रूचिकर व संकुचित करने वाले होते हैं। और छोटे जामुन ग्राही, रुखी और पित्त, कफ रक्तविकार और जलन शमन करने वाले होते हैं।। इसकी गुठली मल बांधने वाली और मधुमेह रोगनाशक होती है। 
जामुन बरसात में होने वाला फल है। इसमें थोड़ा खारापन व रुखापन रहता है। जिससे जीभ में ऐंठन हो जाती है। इसलिए यह कम मात्रा में खाया जाता है। बड़े जामुन स्वादिष्ट, भारी, रूचिकर व संकुचित करने वाले होते हैं। और छोटे जामुन ग्राही, रुखी और पित्त, कफ रक्तविकार और जलन शमन करने वाले होते हैं।। इसकी गुठली मल बांधने वाली और मधुमेह रोगनाशक होती है। इसमें प्रोटिन, विटामिन ए, बी, सी, वसा खनिज द्रव्य व पौष्टिक तत्व होते हैं। 
उपयोग 
-जामुन का गूदा पानी में घोलकर या शरबत बनाकर पीने से उल्टी, दस्त, जी-मिचलाना, खूनी दस्त और खूनी बवासीर में लाभ देता है।

- जामुन की गुठली के चूर्ण 1-2 ग्राम पानी के साथ सुबह फांकने से मधुमेह रोग ठीक हो जाता है।

- नए जुते पहनने पर पांव में छाला या घाव हो जाए तो इस पर जामुन की गुठली घिसकर लगाने घाव ठीक हो जाता है।

- इसके ताजे, नरम पत्तों को गाय के पाव-भर दूध में घोट-पीसकर प्रतिदिन सुबह पीने से खून ववासीर में लाभ होता है।

- जामुन का रस, शहद, आँवले या गुलाब के फूल का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक-दो माह तक प्रतिदिन सुबह के वक्त सेवन करने से रक्त की कमी एवं शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। यौन तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।

-जामुन के एक किलोग्राम ताजे फलों का रस निकालकर ढाई किलोग्राम चीनी मिलाकर शरबत जैसी चाशनी बना लें। इसे एक ढक्कनदार साफ बोतल में भरकर रख लें। जब कभी उल्टी-दस्त या हैजा जैसी बीमारी की शिकायत हो, तब दो चम्मच शरबत और एक चम्मच अमृतधारा मिलाकर पिलाने से तुरंत राहत मिल जाती है।

- जामुन और आम का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से मधुमेह के रोगियों को लाभ होता है।

- जामुन की गुठली के चूर्ण को एक चम्मच मात्रा में दिन में दो तीन बार लेने पर पेचिश में आराम मिलता है।

- पथरी हो जाने पर इसके चूर्ण का उपयोग चिकित्सकीय निर्देशन में दही के साथ करें।

- रक्तप्रदर की समस्या होने पर जामुन की गुठली के चूर्ण में पच्चीस प्रतिशत पीपल की छाल का चूर्ण मिलाएं और दिन में दो से तीन बार एक चम्मच मात्रा में ठंडे पानी से लें।

- गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है।

- जामुन का रस, शहद, आँवले या गुलाब के फूल का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक-दो माह तक प्रतिदिन सुबह के वक्त सेवन करने से रक्त की कमी एवं शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। यौन तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।

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समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें|
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चिकित्सा सेवा अथवा व्यवसाय?

स्वास्थ है हमारा अधिकार १

हमारा लक्ष्य सामान्य जन से लेकर प्रत्येक विशिष्ट जन को समग्र स्वस्थ्य का लाभ पहुँचाना है| पंचकर्म सहित आयुर्वेद चिकित्सा, स्वास्थय हेतु लाभकारी लेख, इच्छित को स्वास्थ्य प्रशिक्षण, और स्वास्थ्य विषयक जन जागरण करना है| आयुर्वेदिक चिकित्सा – यह आयुर्वेद विज्ञानं के रूप में विश्व की पुरातन चिकित्सा पद्ध्ति है, जो ‘समग्र शरीर’ (अर्थात शरीर, मन और आत्मा) को स्वस्थ्य करती है|

निशुल्क परामर्श

जीवन के चार चरणौ में (आश्रम) में वान-प्रस्थ,ओर सन्यास अंतिम चरण माना गया है, तीसरे चरण की आयु में पहुंचकर वर्तमान परिस्थिती में वान-प्रस्थ का अर्थ वन-गमन न मान कर अपने अभी तक के सम्पुर्ण अनुभवोंं का लाभ अन्य चिकित्सकौं,ओर समाज के अन्य वर्ग को प्रदान करना मान कर, अपने निवास एमआइजी 4/1 प्रगति नगर उज्जैन मप्र पर धर्मार्थ चिकित्सा सेवा प्रारंंभ कर दी गई है। कोई भी रोगी प्रतिदिन सोमवार से शनी वार तक प्रात: 9 से 12 एवंं दोपहर 2 से 6 बजे तक न्युनतम 10/- रु प्रतिदिन टोकन शुल्क (निर्धनों को निशुल्क आवश्यक निशुल्क ओषधि हेतु राशी) का सह्योग कर चिकित्सा परामर्श प्राप्त कर सकेगा। हमारे द्वारा लिखित ऑषधियांं सभी मान्यता प्राप्त मेडिकल स्टोर से क्रय की जा सकेंगी। पंचकर्म आदि आवश्यक प्रक्रिया जो अधिकतम 10% रोगियोंं को आवश्यक होगी वह न्युनतम शुल्क पर उपलब्ध की जा सकेगी। क्रपया चिकित्सा परामर्श के लिये फोन पर आग्रह न करेंं। ।

चिकित्सक सहयोगी बने:
- हमारे यहाँ देश भर से रोगी चिकित्सा परामर्श हेतु आते हैं,या परामर्श करते हें, सभी का उज्जैन आना अक्सर धन, समय आदि कारणों से संभव नहीं हो पाता, एसी स्थिति में आप हमारे सहयोगी बन सकते हें| यदि आप पंजीकृत आयुर्वेद स्नातक (न्यूनतम) हें! आप पंचकर्म चिकित्सा में रूचि रखते हैं, ओर प्रारम्भ करना चाह्ते हैं या सीखना चाह्ते हैं, तो सम्पर्क करेंं। आप पंचकर्म केंद्र अथवा पंचकर्म और आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रक्रियाओं जैसे अर्श- क्षार सूत्र, रक्त मोक्षण, अग्निकर्म, वमन, विरेचन, बस्ती, या शिरोधारा जैसे विशिष्ट स्नेहनादी माध्यम से चिकित्सा कार्य करते हें, तो आप संपर्क कर सकते हें| सम्पर्क समय- 02 PM to 5 PM, Monday to Saturday- 9425379102/ mail- healthforalldrvyas@gmail.com केवल एलोपेथिक चिकित्सा कार्य करने वाले चिकित्सक सम्पर्क न करें|

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