Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • अमीबायसिस या पेचिश

         अमीबायसिस या पेचिश (गेस्ट्रो इन्टेस्टाइनल अमीबायसिस) अधिकतर अमीबा के संक्रमण से प्रारम्भ में कोई लक्षण नहीं होते हैं। लक्षण प्राय महीनो बाद शुरू होते हैं, कुछ लोगो में लक्षण सामान्य होते हैं, जो की हल्का दर्द और पेट के निचले भाग में गुडगुड की आवाज से प्रारम्भ होते हें, और बाद में दो से तीन ढीले मल आते है । कुछ लोगो में अमीबिक डिसेंट्री के पूरे लक्षण होते हैं जेसे तेज बुखार, पेट में दर्द और रोजाना १० - 15 या अधिक दस्त। प्राय:  यह दस्त पानी जैसा होता है और इसमें रक्त और आव (म्यूकस) रहता है।
             जब अमीबा यकृत तक फ़ैल जाते हैं तो यकृत में फोड़ा हो सकता है,इससे बुखार , उबकाई , उलटी और दर्द जो की पेट के ऊपरी सीधे तरफ होने लगता है , वजन का घटना और बढ़ा हुआ यकृत। यह लक्षण बिना दस्त के साथ भी संभव है|

    अमीबायसिस या पेचिश
           गेस्ट्रो इन्टेस्टाइनल अमीबायसिस बड़ी आँत का संक्रमण को कहते हैं जो की सूक्ष्मदर्शी परजीवी के कारण होता है जिन्हें अमीबा (एंटामीबा हिस्टोलैटिका)कहते हैं।
          क्योकि यह परजीवी बड़ी आँत में रहते हैं वे संक्रमित लोग की मल से फेलते हें और वहाँ से जहां उन जगह पर सफाई प्रबंध नहीं होता  हैं। यह परजीवी उस जगह के फल और सब्जी को भी गंदा कर सकते हैं, जहाँ पर इंसान का मल खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। नदी, झील, कुआ, अदि में भी फेल जाते हें| यह संक्रमित व्यक्ति के गंदे हाथो से भी स्थानातरित हो सकते हैं जो की अपने हाथ प्राय धोते नहीं है,  या ठीक से नहीं धोते हैं। उनके नाखूनो में छुपे रहकर वहाँ से सभी दूर या लोगों में जिनको वे भोजन पानी आदि खाद्य उन हाथों से बांटते हें।
            वास्तव में तो ये बहुत बड़े पिशाच हें मानो जिन्हे अमर होने का वरदान मिल गया हो। 
        एक बार अमीबा मुख में घुस गया तो वह आँत से सफर करते हुए बड़ी आँत में जाकर बैठ जाते हैं। यह परजीवी वहां पर बिना नुक्सान करे रहते हैं। यह अमीबा आँत की दीवार को भेद सकते हैं जो की अमीबिक डिसेंट्री करा देते हैं| यह अमीबा रक्त में भी फ़ैल सकते हैं,  और यकृत तक पहुच सकते हैं या कभी कभी दिमाग में जाकर वे संक्रमण कर एबसेसबना सकते हें। दुनिया की लगभग १० % जनसंख्या अमीबा से संक्रमित होती है विशेषकर वो जो की मेक्सिको , इंडिया , सेंट्रल अमेरिका , साऊथ अमेरिका , अफ्रीका , और एशिया के उष्ण कटिबंधीय जगह पर रहते है । औद्योगिक देशो में अमेबियासिस सबसे आम हाल ही में अप्रावासी लोगो के द्वारा होता हैं और यात्री जो की इन देशो में सफर करते हैं जहाँ पर अमीबा होते है।भारत के कुछ स्थान पर यह ५०% से भी अधिक हे|
           अहानिकार  रूप में अमीबा आँत में सालो तक रह सकते हैं, और कोई लक्षण भी नहीं करते हैं। सभी लोग समझते हें की अब पेचिश ठीक हो गई, पर जेसे ही वह व्यक्ति उनके लिए लाभदायक खाद्य खाता हे वेसे ही वे पुन:  आक्रमण कर देते हें ओर अमीबा अमीबिक डिसेंट्री के लक्षण फिर से मिलते हें।  तो उनका हमला कुछ दिनों से कुछ हफ्तों तक जारी रहा सकता है, यदि फिर भी आपका उपचार नहीं हुआ, फिर आप पर दूसरा हमला भी कर सकते हैं। बार बार के हमले से पेट ओर आंतों में अल्सर हो सकते हें। 

          अमेबियासिसी से रक्षा करने के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है । 

      बचाव ही एक मात्र उपाय हे।
    अगर आप उन हिस्से में सफर करते हैं, जहाँ पर अमीबियासिस आम है,  तो आप संक्रमण होने की संभावना को घटा सकते हैं साफ पानी पी कर जो की केन और बोतलों में रखा गया हो या जिसे उबाल लिया गया हो । सिर्फ वही खाना खाए जो की अच्छी तरह पकाया गया हो । पाश्चर युक्त दूध या दुग्ध सामग्री का ही प्रयोग करे। अगर आप कच्चे फल खाते हैं तो वही खाए जो की हाल ही में काटा ओर छीला गया हो।
    एक बार संक्रामण हो जाने के बाद बार बार के रोग आक्रमण से बचने के लिए आजीवन खाने-पीने का परहेज रखकर बचा जा सकता हे। रोग ठीक करने के लिए ओषधि खाना ही होगी। आयुर्विदिक ओषधि कुटज की छाल का चूर्ण , वटी, ओर इससे बनी ओषधियाँ इसे नियंत्रित रखने के लिए भूत उपयोगी हें। इसका कोई साइट इफेक्ट भी एलोपेथिक ओषधि {टीनिडियज़ोल, मेट्रीडियज़ोल,आदि}की तरह नहीं होता बस खाने में कड़वी जरूर हें। इसका उपाय भी हे की इनसे बने केपसूल ओर गोली भी आजकल बाज़ार में मिलती है।

         चिकित्सा - आयुर्वेदिक चिकित्सा और रोग कारण की पूरी जानकारी होने से इसको ठीक रखा जा सकता है।  

    लघु लाइ चूर्ण 1gram + कुटज छाल चूर्ण1 ग्राम छाछ के साथ दो २ से चार बार भोजन के पूर्व, आरोग्य वर्धनी वटी शंख वटी दो दो गोली दो बार। 

       वत्सकादी क्वाथ या वत्सकादी क्वाथ घन वटी या कुतजा रिष्ट, आरोग्य वर्धनी वटी शंख वटी दो दो गोली दो बार। या कुटज घन वटी 1-1 ग्राम छाछ से या केवल कुटज चूर्ण 3 से 5 ग्राम छाछ से दो बार। ओर हिंग्वास्टक चूर्ण 2 से तीन ग्राम दो बार आवश्यकता अनुसार विशेषकर जब पाचन ठीक नहीं हो रहा हो, परंतु ये सब ओषधियाँ वैध्य के परामर्श से ही ले सकते हें।  

           छाछ/पतला दही का अधिक सेवनकरें । 
     चना/ बेसन एवं बाज़ार के खाने /पीने से दूर रहने पर रोगी को आराम रहता हे।  छाछ इसके परजीवी को निकालकर बाहर करने में सक्षम है |अत: प्रतिदिन अधिक छाछ पीना हितकारी है।  साफ पानी पी कर जो की केन और बोतलों में रखा गया हो या जिसे उबाल लिया गया हो । सिर्फ वही खाना खाए जो की अच्छी तरह पकाया गया हो । पाश्चर युक्त दूध या दुग्ध सामग्री का ही प्रयोग करे। अगर आप कच्चे फल खाते हैं तो वही खाए जो की हाल ही में काटा ओर छीला गया हो। 
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    समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान ,एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें |.
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