Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • Takra dhara The Processes, Method, and Benefits, (तक्र धारा प्रक्रिया, पद्धति, और लाभ)

    आयुर्वेदिक चिकित्सकों के लिए विशेष लेख- धारा [शिरोधारा] सिर पर विशेषकर कपाल पर सुखोष्ण ओषधि क्वाथ, दूध, इक्षुरस, घृत, तेल, आदि से धारा गिराना ही शिरोधारा या शिरोसेक, कहा जाता है|
    धारा के लिए प्रयुक्त द्रव्य के अनुसार इसे तैल धारा, तक्र धारा आदि कहा जाता है| वाग्भट के अनुसार कुछ रोगों जैसे शिर पर होने वाली पिडिकाओं में कपाल पर न गिरा कर सिर पर गिरते हें| इसलिए इसे परिषेक भी कहा जाता है
    तक्र धारा (Takra Or Buttermilk Dhara) एक पारंपरिक आयुर्वेदिक प्रक्रिया है, इसमें तक्र (छाछ)  की एक धारा लक्षित शरीर के अंग पर डाला जाता है| तक्रधारा सोरायसिसउच्च रक्तचापअनिद्रा की चिकित्सा में उपयोगी है|
    तक्र  धारा  कई विकारों में अत्यधिक प्रभावी है|
    तनाव, मधुमेह (Diabetes) या अन्य कई रोगों के कारण, ब्लड प्रेशर (Hypertension) अधिक होने लगता है, शरीर क्लम  (Tiredness) थकान (fatigue) लगती है| शिरो शूल  Headache, पूरे या आधे सिर में दर्द (Hemicrania / Migraine)के साथ और नींद नहीं आती (अनिद्रा Insomnia), या कम आती है, स्मृति नाश, (Loss of memory) होता है या भूल जाने की समस्या (Alzheimer’s) होने लगती है| व्यक्ति इन सब कारणों से अवसाद (Depression) में आने लगता है, इसका प्रभाव सार्व देहिक (सारे शरीर पर) होता है, पीड़ित के बाल असमय सफ़ेद (पालित्य) या बाल झड़ने (खालित्य Hair loss and hair fall), लगते हें| चपापचय (metabolism) प्रक्रिया बिगड़ने या दोषों का प्रकोप (Aggravation of Doshas) के कारण ओजक्षय (Low immunity) होता है, और कर्ण रोग, नेत्र रोग, मूत्र रोग, ह्रदय रोग, अग्निमान्ध, अरुची, होती है|
    तनाव से मुश्किल चर्म रोग किटिभ (सोराइसिस Psoriasis) दारुणक (Dandruff), संधि शेथिल्य (fragile joints), पक्षाघात–Paralysis, मधुमेह जन्य वात रोग Diabetic neuropathy, आदि आदि अनेक रोग होते हें, ये सब तक्र या अन्य शिरोधारा से तनाव मुक्ति होते ही ठीक होने लगते हें
    अन्य सभी रोग भी एक दूसरे से सम्बन्ध होने से जब प्रमुख कारण तनाव दूर होता है और पिट्यूटरी के पोषण से मेटाबोलोज्म सुधरने लगता है, और आश्चर्य जनक रूप से सभी रोग मिटने लगते हें|   

    तक्र धारा का प्रयोग शिर, सर्वांग या एकांग रूप से किया जा सकता है|
    • तक्र  शिरो-धारा  –सिर पर धारा  -शिरदर्द उच्च रक्त चाप, माइग्रेन आदि|  
    • तक्र  काय-धारा या  सर्वांग तक्र धारा  –सारे शरीर पर   तनाव, थकन में|
    • तक्र  एकांगधारा  – शरीर के किसी विशेष भाग पर जैसे सोरायसिस (Psoriasis),में|
    तक्र धारा निर्माण  मुख्य रूप से आवंले का मोटा चूर्ण (Amla Coarse powder) – 1 kg, तक्र  (sour buttermilk) – 500 gms), पानी-  3 lt. लगता है| नागर मोथा आदि सहायक अन्य द्रव्य, रोग और उसकी शक्ति के अनुसार चिकित्सक ले सकते हेंरास्नादी चूर्ण तलम के लिए (for application on the crown of the scalp after the treatment), ग्रंथो में कई योग वर्णित हैं
    ओषधि निर्माण  तक्र धारा हेतु  सामान्यत: नव चिकित्सक निम्न प्रयोग आसानी से कर रोगी को अधिक लाभ दे सकते हें
    प्रथम विधि :-
    आमलिकी चूर्ण को 3 lt पानी में डालकर 1/6  भाग (500 ml) शेष रहने तक क्वाथ करें , और छान लें, इसमें 500 ml छाछ मिला दें, -यह द्रव तक्र धारा हेतु तैयार है|  
    दूसरी विधि :-
    1- 1/2 lt गाय का दूध + पानी 6 lt + नगर मोथा चूर्ण (मोटा) 100 gms  मिला कर दूध मात्र शेष रहने तक क्वाथ , इस दूध को ठंडा होने के बाद दही मिला कर जमा दें|
    जमने के बाद ऊपर की तरह बना आमलकी क्वाथ 750 ml मिला कर मथ कर तक्र बनाये, और तक्र धारा के लिए सुखोष्ण गर्म कर प्रयोग करें|
    तल धारण या तलम - शिरोधारा के बाद तल धारण कराना भी अधिक लाभकारी होता है
    इसमें  रास्नादी चूर्ण को कुछ सेकंड के लिए मल कर माथे पर धारण किया जाता है| इससे वात-काफ का शमन होता है और शीत नहीं बैठती| वेइकल्पिक रूप से कपास रुई के एक खंड पर रास्नादी चूर्ण का पेस्ट या वात शमन के लिए एरंड या निर्गुन्डी पत्र का भी प्रयोग किया जाकर इसे स्थिर रखने सिर के चारों और एक पट्टी बांध दी जाती है|   
    तक्र  धारा के कम से कम दो या अधिक चक्र (एक चक्र में 8,14, 21 दिन होते हें) रोग की गंभीरता अनुसार अंतराल (interval, break,) निश्चित कर के देना चाहिए| नव रोगों में एक चक्र में ही लाभ होता है
    तक्र या शिरोधारा का अर्थ यह नहीं है की अन्य कोई ओषधि न दी जाये, चिकित्सक निर्णित रोगानुसार उचित आयुर्वेदिक ओषधियां भी दी जाने से शीघ्र ओर स्थाई लाभ होता है|
     दुष्प्रभाव:-
    तक्र  धारा की उपचार के दौरान कोई प्रमुख दुष्प्रभाव नहीं देखा गया है। कभी कभी कुछ रोगियों को ठण्ड की प्रतीति हो सकती है| एसे रोगियों में रास्नादी तल धारण विचार कर ही करना चाहिए| यदि ठण्ड लगती है तो क्रिया रोक देना उचित है|
    तक्र धारा के साथ साथ उच्च रक्तचाप या अन्य रोगों की चिकित्सा हेतु, आहार और जीवन शैली में परिवर्तन, ओषधि प्रयोग भी जोड़ना चाहिए, तब ही पूर्ण लाभ लिया जा सकता है|
    तक्र धारा का प्रभाव:- सामान्यत: तक्र (छाछ) और आमलकी (आवंला) का प्रभाव उष्ण होता है, परन्तु नागरमोथा (मुस्ता) के साथ तक्र  मस्तिष्क और पूरे तंत्रिका तंत्र पर एक शीतलक प्रभाव पैदा करता है| इससे शांत मस्तिष्क शरीर के सभी कार्यों ठीक से  नियंत्रित कर पाता है, इससे तनाव और चिंता मुक्ति होती है|  प्रमुख पिट्यूटरी ग्रंथि जो सिर (hypothalamus) में स्थित है, जो कई शारीरिक और मानसिक कार्यों के लिए जिम्मेदार है, को पोषित कर विषाक्त पदार्थों को हटा कर समग्र चयापचय में सुधार करती है
    तक्र  धारा अत्यधिक तनाव में प्रभावी है। जब तनाव हटने से सोरायसिस आदि जैसे मनोदैहिक विकार का एक प्रभावी उपचार हो जाता है|  
    तक्र धारा : उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) के लिए तक्र  धारा सबसे अच्छा विकल्प है।
    तक्र  धारा से रक्त और मस्तिष्क को पोषण की आपूर्ति में सुधार होता है|

    तक्र  धारा उच्च रक्तचाप और इसकी जटिलताओं  (Complications) से पीड़ित लोगों के लिए सबसे अच्छा विकल्प है



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    मस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें| इसका प्रकाशन जन हित में किया जा रहा है।
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