Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • Freedom from the big crisis by examining diseases at the time. {समय पर रोगों की जांच बड़े संकट से मुक्ति|}

    समय पर रोगों की जांच बड़े संकट से मुक्ति|  
    कुछ लोग ज्योतिषी से भविष्य पूछते हें, जबकि सच्चा भविष्य ज्ञान तो किसी चिकित्सक की जाँच लेब में ही मिल सकता है|  पर अक्सर सामान्य स्तिथि में जाँच करने जाने से डरते हें|  
    डरें नहीं, 
    जांचों में कोई खतरा नहीं होता-
    किसी जाँच से कोई रोग हो नहीं जाता-
    जब अच्छा और सुखी जीवन जीने के लिए हम भोजन, भोग-विलास आदि पर व्यय कर सकते हें तो कुछ व्यय उसे वैसा ही सुखी रखने में क्यों नहीं करते? 
    अक्सर कुछ लोग किसी भी जाँच से डरते हें, कुछ स्पष्ट कहते भी है की कुछ निकल आया तो, या गलत रिपोर्ट दे दी गई तो| 
    इसमें डरने की कोई बात नहीं होती, यदि कुछ निकलता है, तो समय पर चिकित्सा से रोग ठीक हो जाता है, यदि संदेह हो तो किस ने लेब में क्रास चेक करवा कर संदेह दूर करने में कोई बुराई नहीं होती, या चिकित्सक बदल कर भी भी को दूर किया जा सकता है| परन्तु इस भय से जाँच ही न करवाएं तो रोग बढ़ने पर अधिक समस्या होगी|

    जाने कुछ सामान्य जांचों के बारे में की वे कब, केसे, क्यों करवाएं|  उनसे किन रोगों का पता चलेगा|   
    1.    कंप्लीट ब्लड टेस्ट (CBC)इससे खून की कमी, बुखार, वायरल इंफेक्शन, एनीमिया, इन्फेक्शन, कैंसर आदि, का पता चलता है, यह कभी भी, खाली पेट या खाने के बाद कराया जा सकता है|  
    इसके अंतर्गत निम्न की जानकारी अलग अलग मिलती है|
    1.1-  हीमोग्लोबिन(Haemoglobin): सामान्य स्तर-  पुरुष: 12-18 gm%, महिला: 11.5-16.5 gm% होता है, 5 gm% से कम और 18gm% से अधिक होना खतरनाक है|  लेवल कम होने पर एनीमिया और अधिक  होने पर पॉलिसाइथेमिया का खतरा होता है|  
    1.2- टोटल ल्यूकोसाइट्स काउंट Total leucocyte count (TLC): सामान्य स्तर- 4000-11000 cumm. यदि यह 2000 से कम, 50,0000 से अधिक है तो खराब स्थिति है|  काउंट अधिक  होने पर ल्यूकीमिया, इंफेक्शन का खतरा और काउंट कम होने पर एनीमिया, बोन मैरो डिसॉर्डर की आशंका होती है| कुछ दवाओं के प्रभाव से भी कम हो सकता है, पर दवाएं बंद करें के बाद भी कम हो तो चिंता की बात है|
    1.3-  रेड ब्लड सेल काउंट (RBC):- सामान्य स्तर- पुरुष- 4.5-6.5 million/ul, महिला- 3.8-5.8 million/ul. इससे कम होने पर खून की कमी की जानकारी होती है|
    1.4- प्लेटलेट्स काउंट- सामान्य स्तर- 1,50,000 - 4,50,000/ul, 50,000/ul से कम, 10,000,00/ul से अधिक मिलना रोग सूचक है|  कम होने पर खून की कमी, वायरल इंफेक्शन या डेंगू का खतरा होता है|
    1.5-  ईएसआर वेस्टरग्रेन (Westergren):- सामान्य स्तर- 0-22 mm 1st Hr, नाजुक स्थिति- 1 से कम, 60 से अधिक, इससे सूजन, संक्रमण का खतरा या खून की कमी हो सकती है|
    1.6 -  ल्यूकोसाइट्स (Leucocytes) काउंट- सामान्य स्तर- 20-40%, नाजुक स्थिति-10% से कम, 70% से अधिक,  हाई काउंट होने पर एक्यूट वायरल इन्फेक्शंस, टीबी, लिम्फोटिक ल्यूकीमिया का खतरा, जबकि लो काउंट होने पर बोन मैरो डैमेज, एपलैस्टिक एनीमिया, ऑटोइम्यून डिसॉर्डर का खतरा होता है|
    1.7- मोनोसाइट्स (Monocytes): सामान्य स्तर- 2-10%, नाजुक स्थिति-1% से कम, 10% से अधिक, अधिक  होने पर टीबी, इंडोकार्डाइटिस में बैक्टीरियल इन्फेक्शन, वैस्कुलर डिज़ीज़, कम होने पर बोन मैरो डैमेज का खतरा|
    1.8- इसिनोफिल्स (Eosinophils):- सामान्य स्तर- 1-6%, नाजुक स्थिति- 1% से कम, 30% से अधिक, अधिक  होने पर अस्थमा, एलर्जी, पैरासिटिक इंफेक्शन का खतरा|
    1.9- पॉलिमॉर्फ्स/न्यूट्रोफिल्स (Polymorphs/ Neutrophils)- सामान्य स्तर- 40-75%, नाजुक स्थिति- 20% से कम, 90% से अधिक| अधिक  होने पर एक्यूट बैक्टीरियल इंफेक्शन और कम होने पर ऑटोइम्यून डिसऑर्डर का खतरा|
    2. किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT)- इस जाँच से किडनी से संबंधित बीमारियां, जैसे कि पथरी, किडनी का टीबी, किडनी का कैंसर, पेशाब की थैली का कैंसर, यूरिनरी ट्रैक इन्फेक्शन, ग्लोमैरोले नेफ्राइटिस, पाइलो नेफ्राइटिस, का पता चलता है| यह जाँच खाली पेट कराइ जाती है|  टेस्ट से 9-12 घंटे पहले पानी के अलावा कुछ और खाए-पीएं नहीं|  लेवल अधिक  होने पर एक्यूट और क्रॉनिक किडनी डिजीज का खतरा पता चलता है|
    इसके अंतर्गत निम्न जाँच आती हैं|
     2.1- यूरिया:- सामान्य स्तर- 15- 45mg/dl, नाजुक स्थिति- 10 से कम, 100 से अधिक पर होती है| स्तर अधिक  होने पर एक्यूट और क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ का खतरा होता है|
    2.2-  क्रेटनिन- सामान्य स्तर- 0.6-1.2 mg/dl,  नाजुक स्थिति- 0.4 से कम, 3.0 से अधिक, स्तर अधिक  होने पर किडनी में गड़बड़ी की आशंका|
    2.3-  यूरीक एसिड- सामान्य स्तर- पुरुष: 3.6-7.7 mg/dL, महिला: 2.5-6.8 mg/dl, नाजुक स्थिति-  1.5 से कम, 10 से अधिक होना किडनी की बीमारी या जोड़ों के दर्द का कारण होती है|
    2.4- सोडियम- सामान्य स्तर- 130-150mmol/L ,नाजुक स्थिति- 125 से कम, 150 से अधिक होने पर नमक और पानी की कमी, किडनी के फंक्शन में गड़बड़ी बताती है|
    2.5- पोटैशियम- सामान्य स्तर- 3.5-5.5mmol/L, नाजुक स्थिति- 3 से कम, 5.5 से अधिकता किडनी, नमक और पानी की कमी बताती है|
    2.6 – क्लोराइड- सामान्य स्तर- 95-110 mmol/L नाजुक स्थिति- 85 से कम, 110 से अधिक, होने पर किडनी फंक्शन में गड़बड़ी की आशंका रहती है|
    2.7- सीरम कैल्शियम - सामान्य स्तर- 8.4-10.4 mg/dL, नाजुक स्थिति- 6.5 से कम, 14 से अधिक मिलने पर नमक या पानी की कमी से सुन्नपन या दौरे की आशंका|
    2.8- कैल्शियम (आयोनिक):- सामान्य स्तर- 4.6-5.3 mg/uL, नाजुक स्थिति- 3 से कम, 6.4 से अधिक स्तर होने पर किडनी फेल होने का खतरा
    3. लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) – यह जाँच कभी भी हो सकती है| इससे लिवर से संबंधित बीमारियां जैसे कि जॉन्डिस, वायरल हेपटाइटिस, लिवर कैंसर, टीबी आदि के बारे में पता चलता है| इसके अंतर्गत निम्न आते हैं|
    3.1- एसजीओटी (SGOT):- सामान्य स्तर- 15-50 U/L, नाजुक स्थिति- 5 से कम, 1000 से अधिक, जाँच से लिवर या हार्ट की समस्या, जॉन्डिस (पीलिया) का पता चलता है|
    3.2- एसजीपीटी (SGPT): सामान्य स्तर- 15-50 U/L, नाजुक स्थिति-1 से कम, 1000 से अधिक होने पर, इससे  लिवर की समस्या, जॉन्डिस का ज्ञान|
    3.3- टोटल बिलिरुबिन (Bilirubin): सामान्य स्तर- 0.2-1.2 mg/dl,  नाजुक स्थिति- 0.2 से कम, 15.0 से अधिक यह जॉन्डिस (पीलया0 होने की सुचना देती है|
    3.4 - अल्कलाइन फॉस्फेट:- सामान्य स्तर- पुरुष: 40-130 U/L, महिला: 35-105 U/L,  
    3.6 - टोटल प्रोटीन्स: सामान्य स्तर- 6.0-8.0gm/dL, नाजुक स्थिति- 4 से कम, 10 से अधिक, इससे लिवर, जॉन्डिस, प्रोटीन की कमी का ज्ञान|
    3.7 - अल्बुमिन: सामान्य स्तर- 3.5-5.5 gm/dL नाजुक स्थिति-  2 से कम, 8 से अधिक होने पर लिवर, जॉन्डिस, प्रोटीन की कमी का ज्ञान|
    4. –रक्त शर्करा ब्लड सुगर -  इससे रक्त में ब्लड में ग्लूकोज का लेवल, और डायबीटीज का पता चल जाता है| इसके अंतर्गत निम्न जाँच होती है|
    4.1 फास्टिंग शुगर, - रक्त में फास्टिंग सुगर का सामान्य स्तर 70-110 mg/dl होना चाहिए, यह खाली पेट, टेस्ट से 9-12 घंटे पहले पानी को छोड़कर कुछ भी नहीं लिया हो और 24 घंटे पहले तक अल्कोहल (शराब) न पी हो, या स्टेरॉयड, मूत्रल दवा (डाइयूरेटिक्स), ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स, एस्प्रिन जैसी दवा टेस्ट से 3 से 4 दिन पहले से न लि हों तो परिणाम ठीक आता है| अधिक मीठा, चुकंदर, गन्ने का रस एक दिन पहले से नहीं लेना चाहिए|
    इस जाँच में रीडिंग अधिक  आने पर डायबीटीज होने की आशंका होती है|
    4 .2- पोस्ट प्रैंडियल (PP):- सामान्य स्तर- 90-160 mg/dl,  यह जाँच  खाना खाने के 2 घंटे बाद होती है| स्तर अधिक  आने पर डायबीटीज हो सकती है|
    4.3-  रैंडम   सामान्य स्तर- 70-140mg/dl,  नाजुक स्थिति-40 से कम,पर 300 से अधिक|  यह जाँच खाली पेट या खाना खाने के बाद किसी भी समय हो सकती है| स्तर से अधिक  होने पर डायबीटीज का खतरा, किडनी में खराबी की आशंका, ब्रेन स्ट्रोक, आंखों में अंधत्व आदि की समस्या की आशंका होती है| कम होने पर चक्कर, बेहोशी, शाक का खतरा होता है|
    4. 4 - एचबीए 1सी (HbA1C)- यह ब्लड शुगर के लिए सबसे अच्छी जाँच (टेस्ट) है, इसमें तीन महीने के एवरेज ब्लड शुगर की जानकारी मिलती है इसलिए इसे एवरेज शुगर टेस्ट भी कहते हैं| इससे डायबीटीज का पता चल जाता है| हीमोग्लोबिन ए 1सी का स्तर 4  से 5.6% बीच सामान्य होता है, 5.7% से 6.4% का अर्थ है आपको मधुमेह (diabetes) का खतरा है, रिपोर्ट में 6.5% या अधिक हो तो यह नाजुक स्थिति है आप डाईविटिज से ग्रस्त है| मधुमेह के रोगी की ब्लड सुगर 5 से 6% की बीच है तो आप मधुमेह पर अच्छा नियंत्रण कर रहे हें| 
    6. थायरॉइड टेस्ट (T3, T4, TSH)इससे हाइपर थाइरॉइड (बढ़ना) , हाइपो थाइरॉइड (कम होना) का पता चल जाता है| यह खाली पेट कराई जाती है| इसका सामान्य स्तर (रेफरेंस रेंज) TSH (Ultrasensitive):- 0.27-4.2/ Free Triiodothyronine (FT3), Serum: -1.8-4.6/ Free Thyroxine (FT4), Serum: -  0.93-1.7 होता है| इस टेस्ट से अगर लेवल अधिक  हो तो हाइपो थाइरॉइड और कम हो तो हाइपर थाइरॉइड होने का पता चल जाता है| कम या अधिकता से कई रोग देखे जाते हें|
    7. लिपिड प्रोफाइल -  इससे कॉलेस्ट्रॉल का लेवल का पता चलता है जो हाई ब्लड प्रेशर, ब्रेन स्ट्रोक, हार्ट अटैक और दिल से संबंधित बीमारियों का कारण होता है| यह जाँच प्रात खाली पेट (रात के खाने के 12 घंटे बाद) की जाती है| सामान्य स्तर या रेफरेंस रेंज कॉलेस्ट्रॉल सीरम= 130-2300 mg/dLतथा खतरनाक स्तर 100 से कम, 300 से अधिक होने पर/  HDL कॉलेस्ट्रॉल= पुरुष: 30-55mg/dl, महिला: 45-65 mg/dL और क्रिटिकल वैल्यू=  20 से कम, 75 से अधिक/ LDL कॉलेस्ट्रॉल सामान्य = 50-150 mg/dL/ क्रिटिकल = 20 से कम, 200 से अधिक होता है|
    8. ईसीजी (ECG) - इससे हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट संबंधी बीमारियों के बारे में पता चलता है यह टेस्ट कभी भी किया जा सकता है|
    कुछ और भी हैं अन्य टेस्ट
    विटामिंस वर्तमान जीवन शेली के चलते कुछ और खास विटामिंस के टेस्ट भी करवाये जा सकते हें|
    B-12 Level यदि थकान, शरीर में पीलापन, काम में रुचि न होना, चक्कर आना जैसे लक्षण हों तो यह जाँच की जाती है|
     इससे नर्वस सिस्टम और न्यूरो डिसीज, एनीमिया के बारे में भी पट चलता है| यह जाँच सुबह खाली पेट, रात को कुछ खाने के 12 घंटे बाद, सामान्य स्तर (रेफ्रेंस रेंज)- 197-771 pg/mL
    Vitamin D-3 (25-OH)- इससे हड्डियों से संबंधित बीमारी का ज्ञान,   सामान्य स्तर -25-100ng/ml, यह जाँच कभी भी हो सकती है|
    अल्ट्रासाउंड (USG Abdomen)-  पेट से संबंधित समस्याओं के लिए, जैसे कि किडनी, पित्त की थैली, आंत में रुकावट, पेट की टीबी आदि,  यह  सुबह खाली पेट कराएँ.  
    लेट्रिन सामान्य एवं स्टूल कल्चर - नवजात शिशु (पैदा होने से) लेकर 13 साल तक के बच्चों के लिए साल में एक बार कराना चाहिए|  
    बड़ों में भी अगर पेट से संबंधित कोई भी समस्या हो तो स्टूल टेस्ट जरूर कराएं| इससे आँतों और पेट में संक्रमण (इन्फेक्शन), पेट में क्रमी आदि का पता चलेगा
    रुटीन यूरिन टेस्ट, यूरिन कल्चर-  यह भी आधी से अधिक बीमारियों के बारे में पता करने में मददगार होति है| इसमें सुबह सबसे पहले आने वाले मूत्र सैंपल दें| इससे गुर्दे, लिवर या यूरिनरी ट्रैक में इन्फेक्शन, पेशाब में जलन, पेशाब में खून आना, डायबीटीज आदि का पता चलेगा|
    इन सबके अतिरिक्त भी स्त्री या पुरुषों की ही कुछ रोग विशेष जाँच (स्पेशलाइज्ड टेस्ट) होतीं है|
    पुरुषों के लिए:
    Ø    प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (PSA) - 45 वर्ष आयु के बाद यह जाँच कराएँ इससे प्रोस्टेट और उसके कैंसर का समय पर इलाज हो सकता है| सामान्य स्तर( रेफ्रेंस रेंज) 0-3.1
    महिलाओं के लिए
    Ø    पेप स्मियर टेस्ट-  इससे सर्वाइकल कैंसर को नियंत्रित किया जा सकता है| यह जाँच सामान्य तौर पर पहली बार सेक्स संबंध बनाना शुरू करने के बाद हर दो-तीन साल में करवाई जाने की अनुशंसा की जाती है|
    Ø    ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड,  इससे ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है| युवा वस्था में जब भी ब्रेस्ट के आसपास कोई गांठ लग, या 40 साल की उम्र के बाद हर दो वर्ष में में कराएं| अगर कोई गड़बड़ी निकलती है तो 'मेमोग्राफी' भी करवाना जरुरी होता है|
    इन उपरोक्त जांचों के  अतरिक्त भी कई प्रकार की जाँच चिकित्सक करवा सकते हें जो रोग विशेष अनुसार होतीं है|

    जाँच विषयक निम्न कुछ जानकारी से जाँच के बारे में कई भ्रम दूर किये जा सकते हें|
    1.        नियमित चेकअप कराने से या रुटीन टेस्ट के लिए ब्लड सैंपल देने का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता|
    2.         ब्लड सैंपल देने से घबराना नहीं चाहिए| टेस्ट सैंपल के रूप में सामान्य तौर पर 2 एमएल 5, 10, या 20 एमएल खून लिया जाता है| इतनी मात्रा में ह्यूमन बॉडी से खून निकालने पर किसी तरह की समस्या नहीं होगी|
    3.        ब्लड सैंपल देते वक्त तनाव न लें| यह सामान्य प्रक्रिया है|
    4.        टेस्ट हमेशा मान्यताप्राप्त लैब में ही कराएं|
    5.        जिन टेस्टों के लिए खाली पेट सैंपल देना जरूरी हैउन्हें खाली पेट ही दें| खाली पेट टेस्ट का मतलब होता है रात भर फास्टिंग के बाद सुबह-सुबह टेस्ट के लिए सैंपल देना, सैंपल देने से 9-12 घंटे पहले पानी के अलावा कुछ और नहीं खाएं-पीएं|
    6.        जब तक बहुत जरूरी न हो टेस्ट से 12 घंटे पहले कोई दवा न लें| परन्तु डायबीटीजहार्ट पेशंटब्लड प्रेशर या दूसरे हाई रिस्क रोगी दवा ले सकते हैं|
    7.         सैंपल देते हुए घबराएं नहीं| आराम से टेस्ट कराएं|
    8.        विशेष जाँच (स्पेशलाइज्ड टेस्ट) हमेशा एक्सपर्ट डॉक्टर की सलाह पर ही करवाएं, अन्यथा धन समय व्यर्थ हो सकता है|  
    कब कराएं रुटीन टेस्ट
    Ø    30 से 40 साल तक की उम्र के स्वस्थ्य व्यक्ति को भी 4-5 वर्ष में एक बार रूटीन टेस्ट जरूर कराना चाहिए|
    Ø    40 से 50 साल की उम्र में प्रतिवर्ष रुटीन टेस्ट कराना लाभ दायक सौदा होगा|
    Ø    अगर आप पूर्ण स्वस्थ हैं, और रुटीन चेकअप के लिए जाँच कराते हैं तो बिना डॉक्टर की सलाह के भी साल-दो साल में टेस्ट करा सकते हैं|
    Ø    टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद एक बार डॉक्टर से सलाह जरूर लें|
    Ø    टेस्ट रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी हो तो डॉक्टर की सलाह पर केवल उस बीमारी से संबंधित आगे के टेस्ट कराएं|
    ध्यान रखने लायक बातें
    ü    अस्पताल और लैब में अलग-अलग तरीकों से टेस्ट करने की वजह से सामान्य स्तर (रेफरेंस लेवल) अलग-अलग हो सकता हैइसलिए इसे आदर्श सामान्य स्तर नहीं माना जाना चाहिए|
    ü     रिपोर्ट में दी गई रेफरेंस रेंज का विश्लेषण और परिणाम खुद न निकालें| लैब के सीनियर पैथलॉजिस्ट शुरुआती सलाह दे सकते हैंबेहतर होगा कि किसी अच्छे चिकित्सक को रिपोर्ट दिखाकर जानकारी लें|
    ü    कभी कभी रिपोर्ट में कई बार रिजल्ट रेफरेंस रेंज से अधिक  या कम दिखता हैलेकिन वास्तविकता चिंताजनक है या नहीं, यह बात कोई चिकित्सक ही बता सकता है|
    ü     टेस्ट रिपोर्ट के विश्लेषण के लिए गूगल सर्च का सहारा किसी नतीजे पर पहुंचने की बजाए कंफ्यूजन बढ़ाने का काम अधिक  करता है और यहां पर सभी जानकारियां सही होंऐसा जरूरी नहीं है|

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