Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • उपवास एवं व्रतों से शरीर का कायाकल्प-चन्द्रायण व्रत|

    जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है,
    उसे चन्द्रायण व्रत कहते है
    उपवास एवं व्रतों से शरीर का कायाकल्प---चन्द्रायण व्रत 
    भारतीय संस्कृति में ब्रत उपवास आदि को बहुत ही महत्व दिया  है| परम्परागत हिन्दू परिवार की महिलाओं के ब्रत उपवासों की संख्या पुरुषो की तुलना में  बहुत अधिक होती  है|  इसके पीछे कारण हे की अधिकांश महिलाये घर गृहस्थी के देनिक कार्यक्रमों में अपना सारा जीवन बिता देती हें| एक छोटी सी चार दीवारी के बीच व्यतीत होती जिंदगी में यह सब शारीरिक फिटनेस को बनाये रखने का एक अच्छा उपाय हे, पर यदि सामान्य देनिक भोजन में असंतुलन हो तो इससे हानि भी हो जाती हे|  पर व्रत उपवास केवल उन्हें ही करना चाहिए यह विचार गलत है|  पुरुषो में भी मोटापन/ नई डाईविटीज आदि अनेक रोग को इन व्रतों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता हे | 
    इस प्रकार के ब्रतो में एक चन्द्रायण व्रत  भी हे|  
    उस व्यक्ति को जिसे अपना स्वास्थ्य ठीक करना हो, ठीक रखना हो उस व्यक्ति को यह व्रतअवश्य करना चाहिये|  इससे शरीर की शुद्धि होती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, रोग निवारक शक्ति बढ़ती है।आहार विहार शुद्ध होने से मन स्वच्छ बनता है। 

    इस व्रत को स्वास्थ्य को महत्व देने वाले लगभग सभी आश्रमों/आचार्यों और बुद्धिमानो ने इस व्रत को अपना रखा है। 
    प्रतिवर्ष या आवश्यकता अनुसार करते रहने से कोई रोग नहीं होता|  पूज्य गुरूदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी ने इसका प्रयोग स्वयं पर तथा अपने रूग्ण शिष्यों पर किया और अनुभव किया कि यह व्रत मानसिक व शारीरिक स्वस्थता के लिये परम उपयोगीहै। उन्होने पाया कि यह व्रत शरीर का कायाकल्प कर देता है।

    चन्द्रायण व्रत क्या है? 

    जो व्रत चन्द्रमा की कलाओ के साथ साथ किया जाता है, उसे चन्द्रायण व्रत कहते है।
    इसे पूर्णमासी से आरम्भ करते है और एक माह बाद पूर्णमासी को ही समाप्त करतें है।
     इस व्रत में व्यक्ति अपनें खाने (24 घण्टे के कुल आहार को) को १६ हिस्सों में विभाजित करतें है।
    प्रथम दिन यानि पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।
    अगले दिन से भोजन का १६वां भाग प्रत्येक दिन कम करते जाते है और अमावस्या को चन्द्रमा शून्य (०) कलाओं वाला होता है अतः भोजन नही लेते है यानि पूर्ण व्रत करतें हैं।
    अमावस्या के अगले दिन से पुनः भोजन कीमात्रा में १६ वें भाग की बढ़ोतरी करते जाते है और पुनः पूर्णमासी को चन्द्रमा पूरा १६ कलाओं वाला होता है अतः भोजन भी पूरा लेते है।
    ब्रत काल में तरल पदार्थ पानी/नीबू पानी /छाछ आदि पेय या रोग यदि कोई हो तो चिकित्सक के परामर्श से कोई तरल लिया जा सकता हे। रोगों से अति ग्रस्त रोगियों को चिकित्सक से इसका पूरा विवरण बता कर परामर्श जरुर ले लेना चाहिए। धीरे धीरे प्रतिदिन भोजन की मात्र कम करने से और धर्मिक भाव जुडा  होने से यह ब्रत  आसानी से पूरा किया जा सकता हे ।
    कब व कहां कर सकते है? 
    पूर्णमासी से पूर्णमासी तक किसी भी मौसम में कर सकतें है।
     अत्यधिक शारीरिक श्रम वाले दिनों इसे नही करना चाहिये।
    स्थान -चरक आदि आयुर्वेद मनीषियों ने इसके लिए कुटी प्रावेशिक विधि की रचना भी की हे , पर वर्तमान परिस्थितियों में घर का एक कमरा भी हो सकता है और कोई अन्य सुविधा युक्त स्थान । पर स्थान का चयन करने पर वातावरण की शान्ति और पवित्रता का विशेष ध्यान तो रखना चाहिये। 
    यदि  गायत्री अनुष्ठान या अपने धर्म के मान से अनुष्टान /ग्रथ पठन/ भी हो तो साथ होने से आध्यात्मिक ऊर्जा भी मिलती है और मानव सत्कार्यो की और प्रवृत्त होता है

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