Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • आहार कि केलोरी केसे जाने?

    आजकल सभी दूर वजन कि नियंत्रित करने के लिए
     भोजन को केलोरी में दिया जाता हे। यह केलोरी क्या हे
     केसे निर्णय करें कि उन्हे कितना भोजन लेना होगा
     जो उन्हे उपयोगी हो इसको जानने के लिए
    आयुर्वेद सिद्धांतों पर आधारित आधुनिक
    तकनीकी प्रयोग से युक्त एक उपयोगी लेख।
    आहार कि केलोरी केसे जाने?
       
    संसार की हर चेतन या अचेतन को गति देने के लिए ईंधन की आवश्यकता पड़ती हें। चेतन जगत के लिए यही कम आहार से होता हे। आहार का एक प्रमुख प्रयोजन "शक्ति"  का उत्पादन हे। शक्ति का अर्थ कार्य करने का सामर्थ्य हे। कोई पदार्थ अपने बल से किसी अन्य पदार्थ को गतिमान या स्थानांतरित कर दे वह ही कार्य हे।
    प्रत्येक कार्य में ऊर्जा, ताप, या उष्णता एक आवश्यक तत्व होता हे। जिसके होने से ही गति होती हे या उस गति से भी वह ऊर्जा उत्पन्न होती हे।
    चेतन जगत में आहार का प्रथम प्रयोजन शक्ति का उत्पादन हे। इसी प्रकार आहार का दूसरा प्रयोजन पोषण होता हे। जिस प्रकार किसी मशीन के कल-पुर्जे घिस कर टूटते फूटते रहते हें उसी प्रकार शरीर के असंख्य कोश, जिनसे शरीर के अंगादि बनते हें वे भी नष्ट होते रहते हें। नष्ट हुए कोशो की स्थानापूर्ति के लिए उनके मान से पोशाक आहार द्रव्यों की आवश्यकता होती हें। ये ही फेट्स, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज, आदि तत्व होते हें। शरीर में पहुँचकर ये तत्व शरीर में उपास्थित अग्नि जिसे आयुर्वेद मनीषियों ने देहोष्मा कहा हे, के द्वारा पच कर शक्ति में परिवर्तित कर देते हें। इस देहोष्मा की उत्पत्ति शरीर की गतिविधियों से होती हे।
    आहार का एक तीसरा भी प्रयोजन होता हे वह हे संग्रह जो कि शरीर में मेद या चर्बी के रूप किया जाता हे। यह संग्रह शरीर अपनी एसी अवस्था के लिए करता हे जब उसे बाहर से किसी भी कारण वश भोजन न मिले। उपवास या भोजन न मिलने कि अवस्था में इसी संग्रह से ऊर्जा या शक्ति मिलती हे।
    केलोरी
    संग्रह के अतिरिक्त शेष दोनों प्रयोजनों के लिए शरीर को आहार कि प्रतिदिन आवश्यकता कितने परिमाण में होगी इसी बात का विचार करने के लिए ताप की इकाई को जिसे "केलोरी" कहा जाता हें मानी गई हे।
    शरीर कि गतिविधियों के लिए ओर उनकी अवस्थाओं जेसे आराम से रहने वाले, सामान्य परिश्रम करने वाले या, अधिक परिश्रम करने वालों के मान से शरीर को कितने केलोरी ताप कि आवश्यकता होगी, ओर उसके लिए कोन कोन से भोजन ओर उनकी कितनी मात्रा की अवश्यकता होगी यह निर्णय किया जाता हे।
    परीक्षणों के द्वारा यह निर्णय किया जा चुका हे कि कार्बोहाइड्रेट, फेट्स, या प्रोटीन कि कितनी कितनी मात्रा के सेवन से कितना कितना केलोरी ताप प्राप्त किया जा सकता हे।
    यहाँ यह भी समझने कि बात हे कि शरीर के विभिन्न अंगों की क्षति पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार के खाध्य कि जरूरत होते हे इन सब के लिए ही "संतुलित आहार" कि परिकल्पना की गई हे।
    केलोरी क्या हे-
    जितने ताप से एक किलोग्राम जल [पानि] का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बडता हे, उतने ताप को एक केलोरी कहते हें। यह प्रयोग शाला में केलोरी मीटर से नापा जाता हें। गणना के अनुसार -
    • एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट से 4॰1 केलोरी ताप उत्पन्न होता हें
    • एक ग्राम स्नेह[फेट] से  9॰3 केलोरी  "   "   "   "   "।
    • एक ग्राम प्रोटीन से     5॰6 केलोरी    "      "    "
    परंतु शरीर में इनके जलने पर केवल 4 ॰ 3 केलोरी ताप उत्पन्न होता हे। एसा इसलिए हे कि शरीर में इन तत्वो के अंदर होने वाले नाइट्रोजन, सल्फर, ओर फास्फोरस आदि का भी दहन होता हे पर शरीर में इनके उपयोग के बाद इन्हे यूरिया, अमोनिया, के रूप में परिणित कर निकाल दिया जाता हे। अत: इनका दहन या युटीलाइजेशन नहीं होता।
    किसे कितनी केलोरी चाहिए?
    वर्तमान विज्ञान द्वरा यह सिद्ध किया गया हे की 70 किलो वजन का व्यक्ति सारे दिन बिस्तर पर रहे ओर भोजन न ले तो वह श्वसन, शरीर कि प्राक्रतिक क्रियायों ओर जीवन कि अनिवार्य चेष्टाओं के द्वारा 1700 केलोरी [यूनिट] ताप उत्पन्न करता हे। इन 1700 केलोरी में से 1200 मांस धातु, 500 ग्रंथियों, द्वरा उत्पन्न किया जाता हे। यदि यही व्यक्ति श्रम परिश्रम करे तो ओर अपना अभ्यस्त देनिक भोजन ले तो उक्त ताप का अनुपात बदल जाएगा।
    इस प्रकार से गणना कर शरीर के वजन के आधार पर किए जा रहे श्रम को ध्यान में रखते हुए अपने भोजन कई केलोरी मात्रा का निर्णय किया जा सकता हें। यदि हमने अधिक भोजन या केलोरी ली हे तो उसके लिए भी कितना अधिक ओर शारीरिक श्रम करना होगा यह निर्णय किया जा सकता हे। यदि हमको वजन आदि घटना हो तो इसी प्रकार गणना कर शरीर कि कितनी जमा चर्बी+कितने अन्य आवश्यक संतुलित आहार कि जरूरत होगी यह निर्णय किया जा सकता हें।   

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