Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • पोरुषीय शक्ति [सेक्सुयल पावर] - केसे मिले ?

    ताकत या शक्ति दायक ओषधि आदि के बारे में जब भी कोई विचार करता हे, तब अपने मान से कई  बातें सोची जा सकती हें। एक यह की उसे खाकर कोई भी बड़ा पहलवान बन जाएगा? या पोरुष शक्ति में बृद्धी होगी? या फिर मस्तिष्क की शक्ति बडेगी? या इसी प्रकार से ओर भी कई विचार !
    शक्ति की इस बात को अच्छी तरह से समझने के लिए आयुर्वेद द्वारा वर्णित सिद्धान्त या ज्ञान को समझना होगा। आयुर्वेद में धातुओं की संख्या सात बताई गई हें। 1 रस , 2 रक्त,  3 मांस,  4  मेद, 5 अस्थि, 6 मज्जा, ओर 7 शुक्र। इसी के आगे एक धातु "ओज"' को भी आठवीं धातु मान लिया गया हे। यहाँ यह बात समझने की हे की इसका मतलब मेटल से या निकालने वाले खून, या मांस आदि से नहीं हे। शरीर में पाये जाने वाले ये रक्त आदि इन धातुओं की प्रमुखता वाले पदार्थ मात्र हें। 
    हम जो भी कुछ खाते पीते, या अन्य शिरा, गुदा, नाक, आदि अंगों के माध्यम से लेते हें, वह सर्व प्रथम "रस" में परिवर्तित होता हे, इस रस की ही सहायता से शरीर के विभिन्न भागों में रक्त ,मांस आदि धातुयें क्रम से बनती हें। ओर ये धातुयें शरीर की आवश्यकता ओर परिश्रम, आराम, आदि के अनुसार अपने समान गुणो वाले रक्त , माँस आदि सभी शारीरिक वस्तुओं की उत्पत्ति करती हें, ओर उन्हे संभालकर रख लेती हें , जिनका उपयोग भोज्य पदार्थो के अकाल[फास्टिंग] के अवसर पर शरीर द्वारा किया जाता हे। 
     रस से शुक्र तक निर्माण एक प्राकर्तिक प्रक्रिया हे, इसमें किसी भी अवरोध का कारण प्रक्रिया की अस्वाभिकता हे, जिन्हे हम रोग या विकार के नाम से जानते हें। 
     नियमित जीवन के कारण यह प्रक्रिया स्वभाविक चलती रहती हे। आवश्यकता के अनुसार इन एकत्र धातुओं को वांछित शक्ति के रूप में अर्थात पोरुष शक्ति, शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति, आदि में परिवर्तित की जा सकती हें। 
    उदाहरण के लिए यदि हम पहलवान बनाना चाहते हें तो शारीरिक शक्ति माँस- पेशी ओर अस्थि[हड्डियों] को मजबूत बनाना होगा इसके लिए अत्यधिक शारीरिक श्रम कसरत आदि करनी होगी। इसी प्रकार बोद्धिक शक्ति के लिए बोद्धिक श्रम करना होगा। इसी प्रकार से अन्य शक्ति का विचार किया जा सकता हे। 
    पोरुषीय शक्ति [सेक्सुयल पावर] किसी भी प्राणी की स्वाभाविक आवश्यकता हे, क्योकि इसीके माध्यम से नई संतान का जन्म होता हे। इसीलिए प्रकृर्ति ने प्रत्येक को इसके लिए स्वभाविक व्यवस्था दी हे।  अत: इसके लिए कुछ विशेष योजना नहीं करनी होगी। बस यह ध्यान रखना होगा की सब कुछ प्राक्रतिक रूप से चलता रहे। किसी भी प्रकार की जीवन चर्या की अस्वाभिकता इसमे हानी कारक होगी। 
    वर्तमान में इसी जीवन चर्या को मनमाने तरीके से अपनाने के कारण इसमें कमी महसूस की जाती हे। यदि कमी हे तो सर्व प्रथम जीवन चर्या को बदल कर ही पुन: खोई  पोरुषीय शक्ति प्राप्त कर सकेंगे। इसके लिए प्रयुक्त होने वाले ओषधि आदि द्रव्य भी तभी कारगर होंगे जब की हम जीवन चर्या सुधार लेंगे, ओर सुधरी ही जीवन चर्या वालों को कोई पोरुषीय ओषधि लेने की जरूरत ही नहीं। 
    सफल सेक्स के लिए किसी भी प्रकार की ओषधि नहीं चाहिए। बस चाहिए तो "शांत मन" "चिंता थकावट रहित सामान्य शरीर" "एकाग्रता"। कोई भी ओषधि क्रमश: रस रक्त आदि का निर्माण करती हुई ही शुक्र बना सकते हे। जो पोरूष का कारण होता हे। 
    सीधे सीधे मात्र घंटे दो घंटे में किसी भी प्रकार की उत्तेजक या मादक ओषधि या पदार्थ का सेवन क्षणिक उत्तेजना देकर पुरुष होने का भान करा तो सकते हें, पुरुष बना नहीं सकते। हाँ व्यभिचारी ओर अपराधी जरूर बना सकते हें। इनका प्रभाव हटते ही  व्यक्ति को तुच्छ होने की प्रतीति होने लगती ओर ओर मर्द कहलाने की भावना अपराधी बना सकती हे।  
    आयुर्वेद में भी कई बाजीकारक [पोरूष वर्धक] खाध्य ओर ओषधियाँ वर्णित की हें, इनमें से अधिकतर शारीरिक दोषों के सुधार के साथ पोरुषीय शक्ति बड़ाती हें, पर इन सब के साथ ही नियमित जीवन की सलाह मानना भी आवश्यक होता हे। जिन्हे  मान कर अपनी भूलो के परिणाम स्वरूप उत्पन्न सेक्स समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता हे। 
    यदि सेक्स की भावना को नियंत्रित रख सके, या सही आवश्यक मात्रा में प्रयोग कर सकें तो धातु परिपाक के अंत में आठवीं धातु जिसे "ओज" कहा गाया हे वह शरीर पर विशेष रूप से चेहरे पर झलकने लगता हे। व्यक्ति सूर्य के समान देदीप्यमान हो जाता हे।  

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