Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • प्रश्नोत्तर- बच्चों की सामान्य समस्या विवन्ध।

    Q- (मेरा बेटा एक दिन छोड़कर पोट्टी (लेट्रिन) जाता है,ओर वह भी टाईट। कुछ समाधान कर सकते हें या ये सामान्य है? ) [mera beta ek do din chod kar potty jata hai aur wo bhi bahut tight. kuch solution kar sakte hai ya ye normal hai? Shikha Sharma]
    A-विबन्ध या टाइट लेट्रिन होना या दस्त लग जाना बच्चों में बहुत आम समस्या है।  लगभग प्रत्येक माता-पिता का यही अनुभव है। इसलिए इसका उत्तर में विशेष रूप से विस्तार में देना चाहूँगा, ताकि इसे समझ कर सभी लाभ उठा सकें।
      सामान्यत: आयु कोई भी हो प्रत्येक मनुष्य को कम से कम एक बार प्रतिदिन शौच (लेट्रिन) जाना ही चाहिए।  सामान्य शौच या मल-त्याग वह होता है जो दर्द रहित हो ओर, आसानी से विसर्जित हो जाये। अर्थात न तो ज़ोर लगाना पढे ओर न ही तेजी से निकले। न अधिक ठोस हो न पतला। मल त्याग के बाद सुखद अहसास हो।   एक सामान्य मनुष्य यदि दो बार पूर्ण आहार लेता है तो दो बार मल त्याग भी सामान्य होगा। इसी प्रकार से अधिक छोटा बच्चा बार बार दूध पीता है इसी कारण कई बार शोच होना भी सामान्य होगा। बच्चा जैसे जैसे बढ़ा होता जाता है, दूध पीने या फीडिंग की बारम्बारीता (फ़्रिकुवेंसी) कम होती जाती है
    इस प्रकार पाचन अच्छा होने से मल त्याग की संख्या भी कम होती जाती है। 
    ईएसए पाया गया है की प्रारम्भ मेँ बचे को अधिक बार दस्त लगते हें इससे माता-पिता दस्त बंद करने की ओषधि देते हें , इससे मल को सक्त बनाता है। ओर उपरोक्त की तरह अधिक टाईट ओर प्रतिदिन शोच नहीं होता तो यह असमान्यता है। 
    गर्भ से बाहर आने के बाद बच्चे को एकदम नया वातावरण ओर भोजन (फीडिंग) मिलता है। उस नए खाद्य के प्रति अनुकूलित होने मेँ समय लगता है। इसी कारण कभी दस्त लगते हें कभी मल सक्त होता है। एसा होने पर बिना डरे सामान्य होने की प्रतीक्षा करना चाहिए। बच्चे को परिवर्तित आहार के प्रति धीरे धीरे अनुकूलित होते हें। अत: एक आहार को बंद किए बिना ही दूसरा आहार बढ़ाया जाता है। जैसे पहिले माँ का दूध-फिर गाय आदि का दूध फिर थोड़ा अधिक ठोस आहार बढाते हुए लगभग एक वर्ष से तीन वर्ष तक चलते हुए परिवार के सामान्य आहार को पचाने योग्य बन जाता है।  इस बीच आहार की न्यूनाधिकता से मल मेँ परिवर्तन हो सकता है। प्रत्येक माता-पिता को इसी स्थिति पर नजर रखना चाहिये, मलत्याग भी प्रतिदिन सामान्य (आयु के अनुसार एक-दो या अधिक बार) नहीं हो तो चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेते रहना चाहिये।
    यहाँ इस बात का उल्लेख भी कर देना आवश्यक है, की बच्चों को होने वाले साधारण रोग सर्दी, जुकाम, खांसी, बुखार, से लेकर न्यूमोनिया, जेसे प्राण घातक रोग का प्रमुख कारणौ में एक शोच का रोज नहीं होना है। एसे बच्चे का पेट साफ होते ही सर्दी जुकाम ओर न्यूमोनिया,भी साधारण ओषधि से ही ठीक हो जाता है। लगातार अधिक समय तक रोज शोच नहीं होने से रोग ये रोग भी होने लगते हें। इसलिए कभी भी यदि बच्चे को रोज साफ मलत्याग नहीं हो तो अधिक चिंता करनी चाहिए।      
    इसका सबसे अच्छा उपाय है, बच्चे को हरड़ का नियमित पान कराया जाए । 
    आयुर्वेद के अनुसार इन सभी परिस्थितियों जैसे रोज शोच न होना, दस्त लगना, सक्त (हार्ड) मल आना आदि सभी समस्याओं के लिए हरड़ घिस कर  माता के दूध, या शहद या गाय के दूध मेँ पिलाना एक अच्छा उपाय है। यह कितनी मात्रा मेँ दिया जाये यह अनुभव से सीखा जा सकता है। पर निश्चिंत रहें की हरड़ अधिकता से अधिक पतले दस्त हो जाना या कमी से कोई असर होना कोई हानी नहीं पहुंचाएगा।  इसी लिए तो हरड़ को माता के समान (देखे) कहा गया है।
    आयुर्वेदिक चिकित्सक इस समस्या के लिए "बाल घुट्टी"  का प्रयोग भी करते हें । आप भी बाज़ार में इसी नाम या अन्य नामों से मिलने वाली बाल घुट्टी चिकित्सक की सलाह से ले सकते हें।
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      समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें|

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