Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • “Agnikarma”- ‘The amazing gift from 'Acharya Sushruta' for painful conditions.’

    Agnikarma- The amazing gift from 'Acharya Sushruta' for painful conditions.
    “अग्निकर्म”- ‘दर्दनाक स्थितियों के लिए 'आचार्य सुश्रुत' का अद्भुत वरदान’ 
    डॉ.मधुसूदन व्यास उज्जैन 
    तत्काल दर्द मिटाने की आश्चर्य जनक चिकित्सा पद्ध्ति!
    आग्निकर्म वात रोगों और साइटिका जैसे रोग जो आर्थिक रूप से कमजोर मजदूरों वर्ग में अधिक पाया जाता है, के लिए अग्निकर्म चिकित्सा आचार्य सुश्रुत[1] का एक वरदान है| क्योंकि इसमें अत्याधिक कम समय, व्यय और ओषधि सेवन से पूर्ण लाभ दिया जाना संभव है|  

    अग्नि कर्म द्वारा मोच, एड़ी दर्द, सिर दर्द, कटिस्नायुशूल और गठिया जैसे रोगों के चिकित्सा के लिए आदर्श है। कई रोग जैसे जानू-शूल (घुटने) (Knee pain), पीठ दर्द (Back Pain), कटिस्नायुशूल (Sciatica), लूम्बेगो (Lumbago), स्पोंडिलोसिस (Lumbar spondylosis), स्लिप डिस्क Slipped Disc, सरवाइकल स्पोंडिलोसिस (Cervical Spondylosis), पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस (Chronic Osteoarthritis), टेनिस एल्बो (Tennis Elbow) कार्पल टनल सिंड्रोम (Carpal Tunnel Syndrome (CTS), एड़ी में दर्द (Heel pain -Planter fasciitis), ग्रीवा शूल (Neck pain), Myofascial pain, Chronic fatigue pain, स्कंध स्तम्भ शूल (Frozen shoulder) Tendonitis आदि, कई वातज रोगों सहित, Warts,पाद कंटक Corn, आदि क्षुद्र रोगों की सफल चिकित्सा की जा रही है|
    अग्निकर्म क्या है?
    आयुर्वेद अनुसार यह एक अच्छी सहायक शल्य प्रक्रिया (para surgical procedure) है| इसमें कई प्रकार की सामग्री का प्रयोग कर शरीर के पीड़ित भाग पर सीधे विशेष अग्निकर्म शलाका से (tools of cauterization) प्रभावित भाग को अग्नि की उर्जा देकर कष्ट को दूर किया जाता है|
    अग्निकर्म आयुर्वेद की एक प्राचीन चिकित्सा तकनीक है, आग्निकर्म को शरीर की विभिन्न मांसपेशियों और उनके विकारों को दूर करने के लिए उपयोगी है|
    अग्नि की सहायता चिकित्सा करना ही अग्निकर्म है| इसमें लोह, ताम्र, स्वर्ण, रजत, वंग, कांस्य, या मिश्रित धातु से बनी अग्नि शलाका (या अन्य पदार्थ) से शरीर के प्रभावित भाग तक विशेष उर्जा (गर्मी) दी जाती है|  
    यह स्वेदन जैसा भी कहा जा सकता है, अंतर इतना है की स्वेदन के समय शरीर के अधिक भाग को ऊष्मा मिलती है, वहीँ अग्निकर्म से एक बिंदु या धातु आदि के स्पर्श स्थान पर ही ऊष्मा दी जाती है|
    इसमें तप्त धातु की छड़ का प्रयोग क्षेत्र, रोग के प्रकार, रोगी की स्थिति, और गंभीरता के आधार पर इसके विशेषज्ञ चिकित्सक के निरिक्षण में किया जाता है|
    अग्निकर्म परम्परागत चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत सेकडों वर्षो से किया जाता रहा है, परन्तु पिछले हजार वर्ष से अधिक की गुलामी, और विदेशी सत्ता द्वारा आयुर्वेद की कई प्रक्रियाओं को उचित संरक्षण, और प्रोत्साहन न मिलने से लुप्तप्राय हो गई थी, परन्तु कई क्षेत्रों में कभी कभी देखी जा सकती जिन्हें क्षेत्रीय रूप से दाग- देना, चेंचुआ लगाना, आदि के नाम से पुकारा जाता है, और अक्सर अनगड (अशिक्षित, और अकुशल) व्यक्तिओं द्वारा किये जाने के कारण अति दग्ध (अधिक जलने) की घटनाएँ सुनने मिलतीं हें, इससे भी वर्तमान में इस विधा को सभ्य समाज स्वीकार न कर सका और इस पद्धति के प्रति आकर्षण नहीं देखा जाता| जबकि यह विधा आर्थिकरूप से कमजोर वर्ग जिनमें मजदुर आते हैं और उनमें गृध्रसी (साइटिका Sciatica) जैसा महा कष्टकारी रोग अधिक पाए जाते हें उनके लिए शीघ्र तत्काल लाभ देने वाली अग्निकर्म चिकित्सा अधिक उपयोगी है|   
    वर्तमान शासन द्वारा में परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों को संरक्षण मिलने से इसकी और भी ध्यान दिया गया और इस पर शोध होकर देश की कई राजकीय और निजी संस्थाओं द्वारा सामान्य-जन को लाभ दिया जा रहा है|  इनमें प्रमुख रूप से राजस्थान में राष्ट्रिय आयुर्वेद संस्थान (National Institute of Ayurveda), मध्य प्रदेश के उज्जैन, भोपाल, आदि स्थानों पर स्थित शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालयों के चिकित्सालयों, गुजरात में जामनगर आदि स्थानों पर, महाराष्ट्र के कई आयुर्वेद महाविद्यालय चिकित्सालयों,  सहित देश के विभिन्न अन्य राज्यों में भी इन सभी प्राचीन चिकित्सा पद्धत्तियों पर शोध कार्य किया जाकर जन-सामान्य को लाभ दिया जा रहा है|
    अक्सर हमको अशिक्षित, और तांत्रिक, मान्त्रिक आदि के द्वारा अग्नि कर्म में रोगिओं को अति दग्ध (अधिक होने) कर शारीरिक हानि पहुंचाई जाने की बात सुनने में आती रहती है, इस बात ने इस अग्नि कर्म चिकित्सा का वीभत्स स्वरूप प्रदर्शित किया है, और समाज को इससे दूर कर दिया है|
    वास्तव में “अग्निकर्म” से चिकित्सा करने पर रोगी को कोई किसी भी प्रकार का कष्ट अनुभव नहीं होता, यही नहीं यदि रोगी की आंख बंद कर दी जाये तो उसे अक्सर पता भी नहीं चलता की अग्नि कर्म कर दिया गया है| (देखे विडिओ जो हमारे केंद्र पर किये अग्निकर्म की प्रक्रिया को दर्शाती है)| 
    videoअग्निकर्म चिकित्सा द्वारा निम्न रोगों में तात्कालिक लाभ देखा गया है|
    सामान्यत एक बार 2 से 3 मिनट में अग्निकर्म की संपन्न हो जाने वाली यह प्रक्रिया को, सप्ताह या पक्ष (15 दिन) के अंतराल से (रोज नहीं) रोग की तीब्रता के अनुसार, किया जाता है, और  यह तीव्र (तेज) दर्द (acute pain) सहित जीर्ण दर्द (पुराने, chronic pain) को ठीक करने के लिए प्रभावी सिद्द हुआ है|
    अधिकाँश मामलों में अनुभव में आया है की, नवीन रोगों के दर्द में जहाँ तात्कालिक लाभ 50 से 75% तक, एक बार ‘अग्निकर्म’ करने से मिल जाता है, जबकि पुराने रोगों में प्रति सप्ताह, एक से अधिक बार तक अग्निकर्म करने से कष्ट से मुक्ति मिल गई| जहाँ नवीन रोगों में केवल अग्निकर्म से ही लाभ हो गया,  वहीँ पुराने रोगों में यदि अग्निकर्म के साथ ओषधि का प्रयोग भी किया, तो तुलनात्मक एकल अग्निकर्म या औषधि चिकित्सा के जल्दी लाभ मिला, इस प्रकार रोगी को औषधि अधिक दिन देने की जरुरत नहीं रही|  
    आयुर्वेद शास्त्रों ( सुश्रुत, अष्टांग ह्रदय, भाव प्रकाश, चक्रदत्त आदि) के अनुसार अग्निकर्म चिकित्सा से अर्श (Piles ), भगंदर, (Bhagandara), ग्ल्युकोमा (Glaucoma), माइग्रेन (Migraine) शिरा शूल (Headache), नेत्र वर्त्म गत रोग (Eyelid disease),  हार्निया (Hernia) etc.की चिकित्सा भी करने का उल्लेख है, इन रोगों में अभी सभी जगह शोध कार्य चल रहे हें|

    Ø  अगला लेख :- कैसे करते हें अग्नि कर्म, कैसे कार्य करती है यह चिकित्सा, किन किन रोगों में कैसे करते हें? अग्नि कर्म विषयक समस्त जानकारी के लिए हेल्थ फॉर आल डॉ व्यास देखते रहें|
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    [1] आग्निकर्म सन्दर्भ
    अग्निकर्म के संदर्भ में प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथो में विस्तार से उल्लेख किया गया है|  (References of Agnikarma from ancient Ayurvedic textbooks):-
    1.     त्वऽ.मांससिरास्नायुसंध्यस्थिस्थितेऽत्युग्ररुजे वायु | [सुश्रुत सूत्र स्थान 12/10]
    त्वचा, मांस-पेशी, शिरा, स्नायु, संधि, और अस्थि में वात दोष के प्रकोप से उत्पन्न गंभीर शूल का उपचार अग्निकर्म से करना चाहिए| Burning (branding) should be done in presence of very severe pain in the skin, muscles,veins, ligaments, joints and bones caused by vata (aggravation).
    2.    तद्दग्धानां रोगानामपुनर्भवात् भेषजशस्त्रक्षारैरसाध्यानां तत्साध्यत्वात च| [सुश्रुत सूत्र स्थान 12/3]
    अग्निकर्म से दग्ध चिकित्सा से रोगों की पुनरावृत्ति नहीं होती, जो वातज रोग ओषधि, और शस्त्र (शल्य Surgical) क्षार आदि चिकित्सा से भी असाध्य हैं, वे अग्नि से नष्ट होते हें| [Diseases treated by thermal cautery will not recur again and also because those diseases which are incurable by the use of medicines, sharp instruments and alkalis will be cured by fire (thermal cautery).]
     3.     स्नेहोपनाहाग्निकर्मबन्धनोन्मर्दनानि च |
            स्नायुसन्ध्यस्थिप्राप्ते कुर्यात् वायावतन्द्रितः || [सुश्रुत चिकित्सा स्थान 4/ 8]
    जब वात स्नायुबंधन, जोड़ों और अस्थियों को प्रभावित कर दे, तब स्नेह (oleation), उपनाह(गर्म प्रलेप), अग्निकर्म,  बन्धन, (पट्टी बांधने) उन्मर्दन (रगड़ कर दवाव से  शरीर के अंग पर मालिश) करना चाहिए| When vata is found affecting ligaments, joints and bones, then therapies such as sneha (oleation), Upanaha (warm poultice), agnikarma (thermal cautery), bandhana (bandaging), unmardana (hard massaging, squeezing or trampling on the body part) should be done.
    4.     अग्निः क्षारादपि श्रेष्ठस्तदग्धानामसंभवात् |
             भेषजशस्त्रक्षारैश्च न सिद्धानां प्रसाधनात् || [अष्टांग ह्रदय सूत्र स्थान 30/40]
    अग्निकर्म और क्षारकर्म में अग्निदग्ध करना श्रेष्ट है, इससे रोग जला दिये जाने से पुनरावृत्ति नहीं होती, अत: रोगों की चिकित्सा हेतु, औषधि, शस्त्र (शल्य चिकित्सा) एवं क्षार चिकित्सा से अधिक सिद्ध (प्रभावशाली)   है|  [Thermal cautery is better than even alkali, for the diseases burnt by it (treated) do not recur and it can be used even (in diseases) which have not been successfully treated by drugs, alkalis and knife.]
    5.     त्वचि मांस सिरास्नायुसंध्यस्थिषु स युज्यते | [अष्टांग ह्रदय सूत्र स्थान 30/41]
    इसका (अग्निकर्म) प्रयोग त्वचा, मांस,शिरा, स्नायु, संधि (जोड़ों) और अस्थियों (हड्डियों) पर किया जाता है। [It is used on the skin, muscle, vein, tendon, joints and bones.]
    6.     स्नायुसन्धिसिराप्राप्ते स्नेहदाहोपनाहनम्| [अष्टांग ह्रदय चिकित्सा स्थान 21/22]
    जब वात दोष स्नायुबंधन, संधिओं, और शिराओं को प्रभावित कर्ता है तब स्नेह (oleation), दहन (अग्नि से दाग़ना) और गर्म उपनाह (गर्म लेप) से चिकित्सा करना चाहिए| [When vata is found affecting ligaments, joints and vein, then it should be treated by sneha (oleation), daaha (thermal cautery) and upanaaha (warm poultices)].
    7.     स्नेहोपनाहाग्निकर्मबन्धनोन्मर्दनानि च |
            क्रुद्धे स्नायुगते वाते कारयेत् कुशलो भिषक् || [भाव प्रकाश वात व्याधि चिकित्सा 257]
    जब वात स्नायुबंधन को प्रभवित करे, तब स्नेह (oleation), उपनाह (गर्म प्रलेप), अग्निकर्म, बन्धन, उन्मर्दन का प्रयोग करना चाहिए|
    When vata is found affecting ligaments, then therapies such as sneha (oleation), Upanaha (warm poultice), agnikarma (thermal cautery), bandhana (bandaging), unmardana (hard massaging, squeezing or trampling on the body part) should be done.
    8.     कुर्यात् सन्धिगते वाते दाहोपनाहनम् || [भाव प्रकाश वात व्याधि चिकित्सा 259]
    जब वात दोष से संधि, प्रभावित हो तब दहन और उष्ण उपनाह (गर्म लेप) से चिकित्सा करना चाहिए|  [When sandhi (joints) are affected by vata, then it should be treated with daha (thermal cautery) and upanaha (warm poultices).]
    9.     स्नेहोपनाहग्निकर्मबन्धनोन्मर्दनानि च |
            स्नायुसन्धिसिराप्राप्ते कुर्यात् वाते विचक्षणः || [चक्रदत्त वात व्याधि चिकित्सा -9]
    जब वात दोष स्नायु, संधि, शिरा, को प्रभावित करे तब स्नेह, उपनाह,बंधन,उन्मर्दन और अग्निकर्म से चिकित्सा की जाना चाहिए| 
    When vata is affecting the snayu (ligaments), sandhi(joints), and sira(veins), it should be treated with sneha (oleation), agnikarma(thermal cautery), bandhana(bandaging) and unmardana (hard massaging ,squeezing or trampling on the body part).
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