Rescue from incurable disease

Rescue from incurable disease
लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |

Cancer, Diabetes, Kidney like diseases, Caused by acidity in the blood! -You can avoid them. कैंसर, मधुमेह, किडनी जैसे कई रोग, होते हें रक्त में अम्लता के कारण! - और आप उनसे बच सकते हें!

कैंसर, मधुमेह, किडनी जैसे कई रोग, होते हें रक्त में अम्लता के कारण! - और आप उनसे बच सकते हें!
हर व्यक्ति का यह सपना होता है की वह अपना घर बनाये, और जब भी मोका मिलाता है तब वह बाज़ार से सबसे अच्छे सीमेंट, रेट, ईंट, आदि ही खरीदना चाहता है| यही नहीं उनका अनुपात भी “संतुलित” नियमों के अनुसार ही मिलाना चाहता है| कोई नहीं चाहता की सीमेंट आदि की कमी-वेशी करके मकान बनाये|
 परन्तु जिस घर में वह पैदा होने से रह रहा है उसकी और कोई ध्यान नहीं देता| में यहाँ ईंट सीमेंट के मकान की बात न कह, उस शरीर की बात कर रहा हूँ जिसमें वह पैदा होने के बाद से ही रह रहा है| 

हमारा शरीर भी छोटी-छोटी कई कोशिकाओं से मिल कर बना होता है, जनकी आयु भी 2 दिन से लेकर कई वर्ष की होती है|  इन कोशिकाओं के अन्दर चपापचय (Metabolism) की प्रक्रिया सतत चलती रहती है, चयापचय की प्रक्रिया से आहार को उपयोगी ऊर्जा में बदलने का काम होता है|  शरीर की कोशिकायें संतुलित मात्रा वाले आहार से प्राप्त प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैटी एसिड का प्रयोग मैं, विकास, रखरखाव और मरम्मत के लिए करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मानव शरीर और जीवन को बनाए रखने वाले हजारों कोशिकाओं को सक्षम किया जाता रहता है|
अब यदि हम अपने इस शरीर को लगातार दूषित या “असंतुलित” मात्रा में इन प्रोटीन आदि पहुंचाते रहेंगें तो शरीर की इन कोशिकाओं का विकास, रखरखाव, मरम्मत आदि कार्य भी उसी प्रकार होने लगेगा जो ख़राब सीमेंट, ईंट, आदि से किसी भवन का होता है, अर्थात समय से पाहिले भवन कमजोर, जर्जर, और नष्ट हो जायेगा|  
शरीर भी किसी ऐसे मकान की तरह केंसर, ह्रदय रोग, आदि आदि कई छोटे बड़े रोगों से ग्रस्त होकर  जर्जर, और समय पूर्व नष्ट होने की स्थिति में पहुँचने लगेगा|
वर्त्तमान चिकित्सा शोधों में इस असंतुलित खाद्य को अम्लीयता बढाने वाला खाना कहा गया है|
आयुर्वेद में इस असंतुलित भोजन को ही मिथ्याहार-विहार का नाम दिया है|
यदि फेटी एसिड (लिपिड- जो शरीर के लिए आवश्यक है, घी तेल,आदि चर्बी युक्त), का प्रयोग हो या मांस बढ़ने वाला प्रोटीन, या ऊर्जा (एनर्जी) देने वाला कार्बोहाइड्रेट आदि कोई भी हो अधिक या कम मात्रा में लगातार खाया जाता रहता है, तो शरीर की कोशिकाएं भी उस खाध्य के अनुरूप प्रतिक्रिया करने लगतीं हैं, इससे उनके जींस और डीएनए में भी परिवर्तन होने लगता है| फिर वे कोशिकाएं अपने सामान ही अन्य कोशिकाओं में विभाजित होने लगतीं है, इस प्रकार के परिवर्तन से सोगात के रूप में केंसर जैसे ही रोगों का सामना करना होता है|
यह अम्लीय भोजन या खाध्य जिसे स्ट्रीट फ़ूड, फ़ास्ट फ़ूड आदि नाम दिया गया है, वह असंतुलित भोजन ही सामान्यत अम्लीयता (एसिडिक) उत्पन्न कर जींस में परिवर्तन करता है| 
सामान्यत अम्लीय भोजन को खट्टा स्वाद वाला माना  जाता है, अक्सर हम जिन चीजों को खाते हें उनके रस (स्वादों) मीठा, कडवा, खारा आदि, को तो अच्छी तरह जानते हें, परन्तु शरीर में पहुंचकर वे किस रस और रूप में परिवर्तित होते हें, नहीं जानते|
अक्सर कभी मीठा नमकीन आदि भी खाने के बाद कभी कभी खट्टी डकार, जलन ठंडक आदि की पेट में अम्लीयता की सुचना मिलती है| एसा उन खाध्य को खाने के बाद उन्हें पचाने अधिक मात्र में पेट और पाचन संस्थान में आये अम्ल (एसीड, तेजाब) आदि, के कारण होता है| 
सदियों पूर्व से आयुर्वेद में इसी बात को “विपाक” के नाम से परिभाषित किया जाता रहा है|
जब भी कोई कुछ आहार सेवन करता (खाना-पीना) है, वह आहार द्रव्य शरीर के अन्य रस आदि से मिलकर प्रतिक्रिया कर नवीन द्रव्य बनाते हें| इनका अपना नया रस, गुण आदि बन जाता है, इसी प्रक्रिया को विपाक कहते हें|
आयुर्वेद विज्ञान में इस विषय में और भी अधिक विचार किया गया है| इस अम्लीय या क्षारीयता की उपस्थिति शरीर में उपस्थित रस (तरल-द्रव्य), रक्त (blood), मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, और शुक्र समस्त सातों धातु (आयुर्वेद अनुसार) सहित अंत में “ओज” को भी प्रभावित करती है| इन्ही के कारण “वात, पित्त, कफ” भी अपनी सामान्य अवस्था, वृधि, संचय, और प्रकोप कर, रोगी-निरोगी शरीर, स्वास्थ्य, आदि की सुचना देते हें|     
आयुर्वेद क्रिया-शारीर या शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) में आहार (खाये गये) पदार्थ के “रस, गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव” का विस्तार से वर्णन किया गया है, संक्षेप में आहार द्रव्यों में रस छह (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, और कषाय), गुण बीस (गुरु-लघु, शीत-उष्ण, स्निग्ध-रुक्ष, मंद-तीक्ष्ण, स्थिर-सर, मृदु-कठिन, विशद-पिच्छल, श्लक्ष्ण-खर, सूक्ष्म-स्थूल, सान्द्र-द्रव), होते हें| आहार द्रव्यों के अतिरिक्त ओषधि द्रव्यों में व्यवाई, विकासी, आदि गुण भी होते हें|
ओषधियों के ये गुण जब विशेष शक्ति संपन्न होते हें तब उनको “वीर्य” कहा जाता है|
पेट में पहुंचकर विभिन्न रस आदि (जठराग्नि) के संयोग से इन आहार और ओषधि द्रव्यों का पाचन (परिपाक) होता है, इससे जो नया द्रव्य पैदा होता है उसे “विपाक, या निष्ठापाक” कहा जाता है|
इस विपाक प्रक्रिया से द्रव्य का रस (मधुर आदि) अधिकतर उसके मूल द्रव्य के अनुसार होता है, परन्तु कभी कभी उससे भिन्न भी होता है| जेसे नीबू का रस अम्लीय (खट्टा) होता है, पर विपाक में वह क्षारीय गुण में बदल जाता है ([1]अन्य उदाहरण)|
समस्त आहार और ओषधि द्रव्य अंत में अपने “प्रभाव” से शरीर में परिवर्तन आदि लाते हें|
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस परिवर्तन (‘विपाक’) को ही पीएच [pH या शरीर के रक्त, मल, मूत्र, लार आदि की अम्लीयता या क्षारीयता] कहकर क्षारीय (Alkaline) और अम्लीय (Acidic) परिवर्तन का नाम दिया है| इसके लिए एक स्केल जो प्राणीयों की सहनशीलता (Tolerance) अनुसार 0 से 14 तक बनाई गई है, इससे (0) कम और 14 से अधिक में प्रणियों की मृत्यु हो सकती है|
 पीएच क्या है?
रक्त आदि का पीएच: रक्त आदि की अम्लता या क्षारीयता का प्रतीक है –
इनके अनुसार किसी भी तरल पदार्थ का पीएच उसकी हाइड्रोजन आयन (एच) सान्ध्रता (concentration) दर्शाता है|  यह निर्धारित स्केल अनुसार 0 से 14 तक होता है| पीएच 7 को संतुलित या  न्यूट्रल (Neutral) माना जाता है|  पीएच का क्रमश: कम होना अधिक अम्लीय रक्त (acidic) होने का, और 7.0 से ऊपर होने पर क्षारीयता (alkaline) प्रतीक है|
पीएच शब्द फ्रेंच "पॉवोइर हाइड्रोजीन" के लिए मूल रूप से संक्षिप्त रूप था, इसका अनुवाद अंग्रेजी में "हाइड्रोजन की शक्ति" या "हाइड्रोजन की क्षमता" के रूप में किया जा सकता है। पीएच का उपयोग रासायनिक पदार्थ के अम्लीय या क्षारीय प्रकृति को मापने के लिए किया जाता है, जिसे एच+आयन सन्त्रप्त्तता (Concentration) के संदर्भ में मापा जाता है|
उल्टी, दस्त, फेफड़े की क्रिया, अंतर्स्रावी (endocrine) क्रियाएं,  वृक्क (गुर्दे) की क्रिया, और मूत्र वाहिनी संक्रमण, आहार (Diet), ओषधि (Medicine) सेवन, आदि से रक्त का पीएच प्रभावित होता है| नाडी परिक्षण से वात-पित्त-कफ दोष के अनुसार इसका ज्ञान अनुभवी वैद्य आसानी से कर सकता है|  
एक सामान्य मनुष्य के रक्त का pH 7.35 से 7.45 के बीच अर्थात कुछ क्षारीय होना चाहिए| यह मनुष्य शरीर के अनुसार सामान्य प्राकृतिक स्थिति (normal Status) होती है|  
आधुनिक काल में इस अम्लीय या क्षारीय रक्त की जाँच लिटमस पेपर से की जा सकती है| शरीर के कुछ अंगों की क्रियाएं pH को प्रभावित कर सकतीं है| जैसे पेट के केंसर में pH 2 तक हो सकता है, जो की तीव्र सल्फुयरिक एसिड जैसा होता है| pH कम होना केंसर और अन्य रोग की और बड़ने का प्रमाण हो सकता है|
जब तक शरीर की स्थिति प्राक्रतिक रहती है, तब तक व्यक्ति स्वस्थ्य रहता है परन्तु जब भी यह स्थिति उलटती है तो कष्टकारी रोगों होने की सम्भावना होने लगती है, आयुर्वेद के अनुसार भी अधिकांश रोगों का कारण भी इसी विपाक का ही प्रभाव होता है|
क्या होता है जब रक्त पीएच (pH) अम्लीय (Acidic) हो जाता है?   
जब भी किसी व्यक्ति को निम्न समस्याएं हों  तो उसका रक्त अम्लीय हो गया है, और सावधान  हो जाये इससे पाहिले की कोई भयानक रोग उसे नष्ट कर दे?  
 इस अम्लीयता की जाँच भी हम स्वयं कर सकते हें|   
 पीएच कैसे करें जाँच ?
प्रात: हम कुछ भी खाने या कुछ पीने से पहले अपनी पहली लार या मूत्र में लिटमस कागज का उपयोग करके अपने पीएच स्तर का परीक्षण कर सकते हैं| यह लिटमस पेपर शहर की किसी भी प्रयोगशाला उपकरण/ रसायन बेचने वालों से लिया जा सकता है|

[7 ph से कम अम्लीय कहा जाता है, और एक 7 से अधिक  पीएच क्षारीय (alkaline) हैं  हमारे मनुष्य के लिए आदर्श पीएच थोड़ा क्षारीय (alkaline) 7.30 - 7.45 होता है| ]



[1] -- शुंठी (सोंठ), और पीपल, कटु होने पर भी मधर विपाक, कुलथी कषाय होने पर भी अम्ल विपाक, आवंला अम्ल और हरीतकी (हरड) कषाय रस होने पर भी विपाक में मधुर, इसी प्रकार तैल मधुर- विपाक कटु, सोवार्चल नमक (काला नमक) लवण पर विपाक- कटु, पटोल तिक्त पर विपाक मधुर आदि|

क्या है अम्लीयता से उत्पन्न समस्या का हल? - 
रक्त में अम्लता बड़ना एक दुश्चक्र की तरह होता है, जैसे जब अम्ल बढ़ता है तो रोग होते हें फिर रोगों से अम्ल बढता है, और यह अंत हीन चक्र शुरू हो जाता है|


समस्त चिकित्सकीय सलाह, रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान (शिक्षण) उद्देश्य से है| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें| इसका प्रकाशन जन हित में किया जा रहा है।
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