Rescue from incurable disease

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लाइलाज बीमारी से मुक्ति उपाय है - आयुर्वेद और पंचकर्म चिकित्सा |
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  • अपस्मार या ऐपिलेप्सी

    Q- Sent to Link Number: c19b4
    Sender Name: naveen daiya
    mujha epilepsy(mirgi) rog ha 15 year se koi upaya batye ese sahi karne ka main bahut paresan hu

    A-मिरगी का दौरा पड़ऩे पर लोग सुध-बुध खो देते हैं।  इससे डरने की जरूरत नहीं, क्योंकि इसका इलाज संभव है। यह दैवीय प्रकोप या जादू-टोने से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि इसका संबंध मस्तिष्क से है।
        मिरगी कुछ सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है। इसे अपस्मार और अंग्रेजी में ऐपिलेप्सी भी कहते हैं। यह न्यूरॉजिकल डिस्ऑर्डर यानी दिमाग की नसों से जुड़ा रोग है। इसमें मरीज को दौरे पड़ते हैं, जो आमतौर पर 30 सेकेंड से लेकर 2 मिनट तक के होते हैं। कुछ मरीजों में दौरे की अवधि लंबी भी होती है। दौरे के दौरान मरीज का बेहोश हो जाना, दांत भिंच जाना, शरीर लडख़ड़ाना, मुंह से झाग निकलना आम है।
           किसी को कम से कम दो या इससे ज्यादा बार दौरा पड़े तभी उसे मिरगी का मरीज माना जाता है। इंफेक्शन वाला पोर्क, बीफ और पालक तथा बंदगोभी जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों से भी मिरगी हो सकती है।  इससे बचने के लिए डॉक्टर सब्जियों को धोकर और बंदगोभी के पत्तों की ऊपरी दो-तीन परतें उताकर इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं।
       मिरगी के पीछे ओर भी कई वजहें हो सकती हैं। यह बच्चों में बुखार, दिमाग का सही विकास न हो पाने और सिर पर चोट (ब्रेन  इंजरी) से भी हो सकता है। ब्रेन में इंफेक्शन और ट्यूमर भी वजह हो सकते हैं। इसका अर्थ यह हे की यह सीधे तौर पर दिमाग से जुड़ी समस्या है। हमारे दिमाग में इलेक्ट्रिक एक्टिविटी चलती रहती है, लेकिन जब यह एक्टिविटी या इलेक्ट्रिक डिस्चार्ज बढ़ जाता है तो झटके लगने या बेहोशी की दिक्कत आती है।
         मिरगी के लक्षण दिखने पर टोने टोटके या झाड़-फूंक आजमाने की बजाय न्यूरोलॉजिस्ट से ही संपर्क करना चाहिए। 
    इसकी पुष्टि के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन या ईईजी की जरूरत होती है। इन्हीं टेस्ट के जरिए मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों में इलेक्ट्रिक एक्टिविटी देखी जाती है। हिस्टीरिया के मरीज में भी मिरगी जैसे लक्षण हो सकते हैं, लेकिन इसकी पुष्टि टेस्ट के बाद ही होती है।
       आयुर्वेदिक चिकित्सा -सामान्यत: इसकी कोई प्रमाणिक चिकित्सा आयुर्वेद में नहीं है, परंतु हमारा शरीर किसी भी रोग को स्वयं ठीक करने की कोशिश करता रहता है अत: सहायक रूप से ब्राम्ही घृत, सारस्वतारिष्ट, ओर अपस्मार हर रस( कृष्ण गोपाल कालेडा), आदि ओषधिया आयुर्वेदिक चिकित्सक के परामर्श के साथ ही लेनी चाहिए। इससे रोग दोरे की बारंबारता में कमी आती है ओर कभी कभी 5से 10% तक रोग ठीक भी होते देखा गया है।  

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    समस्त चिकित्सकीय सलाह रोग निदान एवं चिकित्सा की जानकारी ज्ञान(शिक्षण) उद्देश्य से हे| प्राधिकृत चिकित्सक से संपर्क के बाद ही प्रयोग में लें|

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